
नई दिल्ली। इस साल को अंकों के हिसाब से देखें तो इसका अर्थ है 'रुस्तख़ीज़े बेजा' यानी बेकार की क़यामत और अगर साफ़ साफ़ पूछो तो 16 रमज़ान 1273 हिज़री को सोमवार के दिन दोपहर के वक़्त यानी 11 मई 1857 को अचानक दिल्ली के क़िले और दीवारें लरज़ उठी, जिसका असर चारों तरफ़ फैल गया। यह पंक्तियां हैं ऊर्दू के महान कवि असदुल्लाह खां गालिब की लिखी फारसी भाषा की किताब रुदाद के हिंदी संस्करण 'दस्तंबू' की। जो 1857 के विद्रोह पर लिखी गई थी।
राजकमल प्रकाशन ने रुदाद के हिंदी संस्करण 'दस्तंबू' को प्रकाशित किया। जिसे फारसी से हिंदी में अनुवाद डॉ। सैयद ऐनुल हसन और संपादन अब्दुल बिस्मिल्लाह ने किया।
गालिब 'दस्तंबू' में आगे लिखते हैं कि... मैं भूकंप की बात नहीं कर रहा हूं। इस दिन जो बहुत मनहूस था, मेरठ की फ़ौज के कुछ बदनसीब जांबाज़ सिपाही शहर में आए। निहायत ज़ालिम, उग्रवादी और अंग्रेज़ों के ख़ून के प्यासे।
शहर के विभिन्न दरवाज़ों के चौकीदार जो उन फ़सादियों के पेशे वाले और भाई बंद थे, इसमें कोई हैरत नहीं कि पहले से ही उन फ़सादियों में साठगांठ हो गई हो शहर की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी और नमक के हक़ सब को भूल गए, इन बिन बुलाए मेहमान या आमंत्रित लोगों का स्वागत किया।
उन मदहोश सवारों और अखड़ पैदल सिपाहियों ने जब देखा कि शहर के दरवाज़े खुले हुए हैं और चौकीदार मेहमान नवाज़ हैं तो वे दीवानों की तरह इधर-उधर दौड़ पड़े। जिधर किसी अफ़सर को पाया और जहां आदरणीय लोगों (अंग्रेज़ों) के मकान देखे जब तक उन अफ़सरों को मार नहीं डाला और उनके मकानों को बिल्कुल तबाह नहीं कर दिया उधर से कहीं और नहीं गए।
कुछ मिसकीन गोशानशीन जिनको अंग्रेज़ी सरकार की मेहरबानी से कुछ नमक रोटी मिल जाती थी वे शहर के विभिन्न क्षेत्रों में एक-दूसरे से दूर ज़िंदगी के दिन गुज़ार रहे थे।
ऐसे शांतिप्रिय लोग जो तीर और भाले के फ़र्क़ से अनजान थे और अंधेरी रातों में चोरों के शोर से डर जाते थे, जिनके हाथ तीर और तलवार से ख़ाली थे, सच पूछो तो ऐसे लोग हर गली, हर मुहल्ले और शहर के हर भाग में थे।
ये ऐसे नहीं थे कि लड़ाई कर सकें...वे अपने आप को मजबूर समझ कर सोग और मातम करते हुए अपने घर में बैठ रहे।
ऐसे ही सोग करने वालों में से एक मैं भी हूं। मैं अपने घर में बैठा हुआ था कि हल्ला-गुल्ला सुना। चाहता था कि मालूम करूं कि इतने में शोर मचा कि क़िले के अंदर साहब एजेंट बहादुर और क़िलादार क़त्ल कर दिए गए।
हर तरफ़ से प्यादों और सवारों के दौड़ने की आवाज़ें उठनी शुरू हुईं ज़मीन हर तरफ़ गुलअंदामों (यानी अंग्रेज़ों) के ख़ून से रंगीन हो गई। बाग़ का हर कोना वीरानी और बरबादी के कारण बहारों का क़ब्रिस्तान बन गया।
मेरठ की विद्रोह की खबर मिलते 17 सितंबर 1857 को मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने लाल किला छोड़ दिया। वो दिल्ली के महरौली इलाके में थे जब ब्रिटिश मेजर हॉडसन और उसके सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। यानि आज से ठीक 160 साल पहले 20 सितंबर 1857 के दिन शाहजहांबाद से अपने कब्जे में ले लिया। जिस वक्त बहादुर शाह जफर को ब्रिटिश मेजर हॉडसन ने पकड़ा तबतक शाहजहांबाद चारदीवारी वाला शहर खाली हो चुका था।
Published on:
20 Sept 2017 04:10 pm
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