29 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पति का अवैध संबंध होना पत्नी के प्रति क्रूरता नहीं- सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा, आत्महत्या का भी आधार नहीं बनाया जा सकता। पत्नी ले सकती है तलाक। 

2 min read
Google source verification

image

rohit panwar

Nov 25, 2016

external marriage affair

external marriage affair

नई दिल्ली. अगर किसी पति का विवाह के बाद भी अवैध संबंध है तो इसे पत्नी के प्रति पति की क्रूरता नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में एक पति को बरी करते हुए ऐसा कहा। इस मामले में पत्नी ने पति के विवाहेतर संबंधों के कारण आत्महत्या कर ली थी।

पति की बेवफाई आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं

कोर्ट ने कहा कि विवाहेतर संबंधों को अवैध या अनैतिक माना जा सकता है। लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता मानकर पति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि इसे आपराधिक मामला करार देने के लिए कुछ और परिस्थितियां भी जरूरी होती हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा और अमित्व रॉय की बेंच ने कहा कि सिर्फ पति की बेवफाई को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं माना जा सकता। दरअसल, इस केस में दीपा नाम की महिला ने पति के विवाहेतर संबंधों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। दोनों की शादी को सात साल हुए थे। दीपा के बाद उसके भाई और मां ने भी सुसाइड कर लिया था।

कोर्ट का तर्क

कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता इस पर निर्भर करती है कि व्यक्ति किस परिवेश या परिस्थितियों से गुजर रहा है। पीठ ने कहा कि विवाहेतर संबंध आईपीसी के सेक्शन 498-ए(पत्नी के प्रति कू्ररता) के दायरे में नहीं आता है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि क्रूरता सिर्फ शारीरिक नहीं होती, बल्कि मानसिक टॉर्चर व असामान्य व्यवहार के रूप में भी हो सकती है। यह केस के तथ्यों पर निर्भर करेगा। कोर्ट ने कहा कि महिला तलाक या अन्य किसी प्रकार का फैसला ले सकती थी।

तलाक का आधार बन सकता है

कोर्ट ने कहा कि हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि अगर कोई पति विवाहेतर संबंध बनाता है तो यह किसी भी तरह से आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जाएगा। हालांकि इसे तलाक का आधार बनाया जा सकता है। पीठ इन मामलों में निचली अदालत से सजा पाए व्यक्ति की अर्जी पर विचार कर रही है। पत्नी पर मानसिक अत्याचार और उसे आत्महत्या के लिए बाध्य करने के आरोप में उक्त शख्स को कर्नाटक हाई कोर्ट ने सजा दी थी। शीर्ष अदालत ने सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी सजा निरस्त कर दी।

ये भी पढ़ें

image
Story Loader