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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, स्कूल-कॉलेज, मोबाइल कंपनियां और बैंक नहीं मांग सकेंगे आधार

आधार कार्ड अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। जस्टिस सीकरी इस मामले पर फैसला पढ़ा।

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, आधार पर हमला संविधान के खिलाफ

नई दिल्ली। आधार कार्ड अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया। जस्टिस सीकरी इस मामले पर फैसला पढ़ा। जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार और दूसरे पहचान पत्रों में मौलिक अंतर है। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों आधार सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला विषय बना है। जस्टिस सीकरी ने आधार पर सवाल उठाने को संविधान के खिलाफ बताया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आधार का लक्ष्य कल्याणकारी योजनाओं को समाज के वंचित तबके तक पहुंचाना है और वह ना सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि समुदाय के दृष्टिकोण से भी लोगों के सम्मान का ख्याल रखती है। संविधान पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति एके सीकरी, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने फैसला पढ़ा।

आधार पर फैसले के 10 महत्वपूर्ण बिंदू—

1— सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
2— दबे कुचले तबके को सम्मान मिल रहा है।
3— सुप्रीम कोर्ट ने खत्म की आधार एक्ट की धारा 57, अब प्राइवेट कंपनियां नहीं मांग सकती आधार
4— आधार ने समाज के वंचित तबकों को ताकत और पहचान दी है।
5— आधार पर हमले को बताया संविधान के खिलाफ
6— आधार पूरी तरह से सुरक्षित, इसकी डुप्लीकेसी की गुंजाइश नहीं
7— स्कूल में दाखिले में आधार कार्ड जरूरी नहीं
8— सीबीएसई नीट में आधार कार्ड जरूरी नहीं
9— बैंक अकाउंट से भी लिंक नहीं होगा आधार
10— मोबाइल से भी नहीं लिंक करना होगा आधार

आपको बता दें कि इससे पहले आधार मामले की सुनवाई 17 जनवरी को शुरू हुई थी। यह सुनवाई पूरे 38 दिनों तक चली थी। फैसला इस बात पर आना है कि आधार से किसी की निजता का उल्लंघन होता है या नहीं। दरअसल, सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के अलावा केंद्र व राज्यों की सभी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता पर रोक लगाई गई है। इन योजनाओं में मोबाइल सिम और बैंक खाते भी शामिल हैं। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से डेटा प्रोटेक्शन को लेकर सख्त नियम बनाने की बात कही।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने चार महीने के दरम्‍यान 38 दिन इस मुद्दे पर सुनवाई की थी। सुनवाई समाप्‍त होने के बाद 10 मई को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। आधार की अनिवार्यता के विरोध में 31 याचिकाएं दायर हुईं थीं। इस मामले में सबसे पहले उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश केएस पुत्तास्वामी की याचिका दायर कर इसे चुनौती दी थी। पुत्तास्‍वामी ने 2012 में आधार की अनिवार्यता के खिलाफ याचिका दायर की थी। संविधान पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति धनन्जय चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण भी शामिल थे और इस दोनों न्यायाधीशों ने अपने फैसले अलग-अलग लिखे हैं।

आधार क्‍या है
आधार हर नागरिक के पहचान की एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जिसके तहत सरकार द्वारा सभी नागरिक को 12 अंकों का आधार नंबर दिया जा रहा है। इसके तहत लोगों की निजी सूचनाओं के साथ बायोमैट्रिक्स यानी चेहरे का विवरण, अंगुलियों के निशान और आंखों की पुतली के निशान का सरकार एक डेटा-बेस बनाने में जुटी है। लेकिन जब सरकार ने सरकारी कामकाज के लिए आधार को अनिवार्यता की श्रेणी में ला खड़ा किया तो इस पर विवाद शुरू हो गया। आधार की अनिवार्यता को निजता के अधिकार के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इसके बाद 2015 में मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने का निर्देश दिया गया। नौ सदस्‍यीय पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। उसके बाद पांच जजों की पीठ इस मुद्दे विचार कर रही थी कि आधार में शामिल सूचना निजता के दायरे में है या नहीं।