
Supreme Court
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक सेवा को सरकार के अन्य अधिकारियों की सेवा के बराबर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि न्यायिक अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों के वेतन और भत्ते समान होने चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ मामले में पारित फैसले में यह टिप्पणी की, जिसमें राज्यों को न्यायिक अधिकारियों के वेतन और भत्ते के संबंध में दूसरे राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया गया था।
सीजेआइ डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने फैसले में कहा, न्यायाधीशों की तुलना प्रशासनिक कार्यपालिका से नहीं की जा सकती। समतुल्यता की दलील खारिज करते हुए पीठ ने कहा, न्यायिक सेवा को राज्य के अन्य अधिकारियों की सेवा के समान तुलना करना पूरी तरह से अनुचित होगा। सेवा के दौरान और बाद में लागू होने वाले कार्य, कत्र्तव्य और प्रतिबंध न्यायिक सेवा के सदस्यों के लिए पूरी तरह से अलग हैं।
अलग वेतन पर आपत्ति नहीं
शक्तियों के पृथक्करण (सेपरेशन ऑफ पावर) की मांग है कि न्यायपालिका के अधिकारियों को विधायी और कार्यकारी विंग के कर्मचारियों से अलग माना जाए। यह याद रखना चाहिए कि जज राज्य के कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक कार्यालय के धारक हैं, जो संप्रभु न्यायिक शक्ति का उपयोग करते हैं। इस अर्थ में उनकी तुलना केवल विधायिका के सदस्यों और कार्यपालिका के मंत्रियों से की जा सकती है। इसलिए न्यायिक शाखा के अधिकारियों के साथ विधायी शाखा और कार्यकारी शाखा के कर्मचारियों के बीच समानता का दावा नहीं किया जा सकता। इसलिए, इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि न्यायिक अधिकारियों को कार्यकारी कर्मचारियों के बराबर वेतन नहीं मिलता है।
न्यायाधीशों की सेवा शर्तें समान होनी चाहिए
कोर्ट ने राज्यों के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सेवा शर्तें राज्य विशेष के नियमों पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि न्यायालय ने यह माना कि देशभर में न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों में एकरूपता बनाए रखने की आवश्यकता है। इस प्रकार, यह दलील कि प्रत्येक राज्य के नियमों को वेतन और भत्तों को नियंत्रित करना चाहिए, इसमें दम नहीं है।
Published on:
11 Jan 2024 01:32 am
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