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उत्‍तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का भारत सख्‍त विरोधी रहा है, अब सुधरेंगे संबंध

चीन और पाकिस्‍तान को भारत विरोधी गतिविधियों से रोकने के लिए उत्‍तर कोरिया से बेहतर संबंध भारत के लिए जरूरी।

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उत्‍तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का भारत सख्‍त विरोधी रहा है, अब सुधरेंगे संबंध

नई दिल्ली। भारत और उत्‍तर कोरिया के बीच 1970 से राजनयिक संबंध हैं। यानि दोनों देश के बीच का संबंध पांच दशक पुराना होने के बाद भी भारत उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के परमाणु कार्यक्रमों का सख्‍त विरोधी रहा है। भारत को इस बात की भी आशंका है कि उत्‍तर कोरिया ने पाकिस्‍तान को परमाणु तकनीक बेचता है। पिछले दो दशक के दौरान रिश्‍तों में नरमी की वजह के पीछे यह एक अहम कारक रहा है। इसके बावजूद मोदी सरकार ने एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी के तहत रिश्‍तों में सुधार की पहल की है और मोदी सरकार के चार साल में तीन बार भारतीय मंत्री वहां का दौरा कर चुके हैं। मोदी सरकार से 20 साल पहले तक भारत का एक भी मंत्री उत्‍तर कोरिया नहीं गया।

यूएन प्रतिबंधों से आपसी ट्रेड पर असर
आपको बता दें कि साल 2006 में किम जोंग ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को दरकिनार करते हुए पहला परमाणु परीक्षण किया था और तभी से संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। भारत ने भी इसका विरोध किया था। यूएन के प्रतिबंधों पर अमल करते हुए उत्‍तर कोरिया से भारत का ट्रेड कम हो चुका है। यूपीए सरकार ने इन सभी का दरकिनार करते हुए किम जोंग से दोस्ताना रिश्ते चाहती थी और इसीलिए ना केवल जरूरी सामान उत्तर कोरिया को भेजा जाता था, बल्कि तानाशाह की सेना को ट्रेनिंग तक भारतीय सेना देती थी, लेकिन अब सबकुछ बंद हो गया है। अब ट्रंप-किम की मुलाकात के बाद से संबंधों में सुधार की गुंजाइश दिखाई देने लगी हैं।

पाक को परमामाणु तकनीक बेचने का आरोप
पिछले कुछ सालों में भारत ने उत्तर कोरिया पर इस बात का भी लगाया कि वह पाकिस्तान को परमाणु तकनीक बेचता है। उत्तर कोरिया को इस बात की चिंता भी रही है कि भारत उसके विरोधी दक्षिण कोरिया से अपनी नजदीकी बढ़ा रहा है। ये बात भी सही है कि दक्षिण कोरिया से नजदीकी के पीछे मुख्‍य भी यही है।

बीजिंग से लेना पड़ता है वीजा
भारत में उत्तर कोरिया का कोई डिप्लोमैट बात करने के लिए तैयार नहीं होता है। वहां के लोग काफी डरे हुए होते हैं। अगर किसी भारतीय को उत्तर कोरिया का वीजा चाहिए होता है तो उसे पहले बीजिंग जाना होता है या फिर चीनी विदेश मंत्रालय के जरिए ही वीजा दिया जाता है। उत्तर कोरिया में भी भारतीय दूतावास बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है। उत्तर कोरिया में कोई राजदूत बनकर नहीं जाना चाहता है। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद जानी-मानी चीनी अनुवादक जसमिंदर कस्तुरिया को प्योंगयांग में भारतीय राजदूत नियुक्त किया गया था।

बेहतर संबंध भारत के लिए लाभकारी
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कोरियन स्टडीज की प्रोफेसर वैजयंती राघवन का कहना है कि उत्तर कोरिया से संबंधों में गर्मजोशी भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकती थी क्योंकि उत्तर कोरिया प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है, यहां कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। अगर हम उत्तर कोरिया को चीन और पाकिस्तान के साथ मजबूत साठगांठ से अलग करना चाहते हैं तो उसके साथ बेहतर संबंध बनाना जरूरी होगा। 1990 में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत में सबसे पहले आगे बढ़कर निवेश करने वाले देशों में दक्षिण कोरिया भी एक था। तब से नई दिल्ली का सोल की तरफ झुकाव ज्यादा घोषित तौर पर सामने आया।