
नई दिल्ली। पिछले साल डोकलाम के मुद्दे पर गतिरोध की वजह से भारत-चीन के बीच संबंध बिगड़ गए थे। इसके साथ ही कई और मुद्दे हैं जिसकी वजह से दोनों के बीच दूरी को बढ़ावा मिला। दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों में भारत-चीन संबंध मुश्किल दौर से गुजरे हैं। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की संभावित सदस्यता के चीन के विरोध को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद रहे हैं। लेकिन अब संबंधों को सामान्य करने की ओर काम हो रहा है। इसके लिए मोदी-जिनपिंग के बीच बैकडोर डिप्लोमेसी को अहम माना जा रहा है। इस डिप्लोमेसी के तहत ही आज पीएम मोदी चीन के लिए रवाना होंगे और वहां पर शी जिनपिंग से अनौपचारिक बात करेंगे।
तिब्बत सबसे ज्यादा अहम
इस डिप्लोमेसी के तहत सबसे ज्यादा जोर तिब्बत के मुद्दे पर दिया जा रहा है। ऐसा इसलिए कि पिछले साल अक्टूबर में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के यूनाइटेड फ्रंट डिपार्टमेंट के कार्यकारी उपाध्यक्ष झांग यीजियोंग ने दुनिया के नाम एक चेतावनी जारी की थी। चेतावनी में दलाई लामा से मुलाकात को अपराध घोषित किया गया। इस चेतावनी में नाम लिए बगैर भारत का भी जिक्र था। झांग ने कहा था कि अगर किसी देश का अधिकारी दलाई लामा से मुलाकात करता है तो एक तरह से अपने देश का ही प्रतिनिधित्व कर रहा होता है जिसे चीन बर्दाश्त नहीं करता। इसके ठीक 4 महीने बाद 22 फरवरी को विदेश सचिव विजय गोखले एक एडवाइजरी जारी कर सरकारी अफसरों को तिब्बत से जुड़े कार्यक्रमों से दूर रहने को कहा। उसी के बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत तेजी से आगे बढ़ी और अब मोदी-जिनपिंग की मुलाकात में अनौपचारिक स्तर पर बातचीत करेंगे। इस कूटनीति को डोकलाम के बाद से ही संबंधों को सामान्य करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि तिब्बत एक संवेदनशील मुद्दा है और इस पर आगे बढ़े बगैर संबंधों को सामान्य करना मुश्किल है।
ट्रेड वार के कारण दबाव में है चीन
इसके उलट दलाई लामा: द सोलजर ऑफ पीस नाम से किताब लिखने वाले विजय क्रांति इसे सभी की कूटनीतिक नासमझी मान रहे हैं। वो कहते हैं कि चीन और अमरीका के बीच ट्रेड वॉर की वजह से शी जिनपिंग दबाव में हैं। जिस बात को चीन के खुले दिल का कदम बताया जा रहा है वो शी की मजबूरी है। ट्रेड वॉर के चलते विश्व समुदाय में चीन के अलग-थलग पड़ने की आशंका है। ऐसे में ये सहज कदम नहीं लगता। इसके पीछे कूटनीतिक रणनीति है जिसे भारत को समझना होगा और भारत को दलाई लामा जैसे ट्रम्प कार्ड की अहमियत समझनी होगी। जरुरी ये है कि तिब्बत को लेकर चीन के दबाव में भारत को आने की जरुरत नहीं है। विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं कि तिब्बत को लेकर हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं है। दलाई लामा से दूरी बनाना और ऐसा करते चीन को दिखाना कॉन्फिडेंस बिल्डिंग का एक तरीका है। इस बात में कोई शक नहीं है कि चीन भी संबंध सामान्य करने को लेकर उतना ही उत्सुक है, जितने हमवरना चीन ऐसे आगे न बढ़ता।
Published on:
26 Apr 2018 12:27 pm
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