7 मार्च 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

रोंहिग्या का सच सामने लाने वाले पत्रकारों को मिली सात-सात साल की सजा

पत्रकारों को सजा मिलने के बाद दुनियाभर में हो रही है निंदा

2 min read
Google source verification
myanmar

रोंहिग्या का सच सामने लाने वाले पत्रकारों को मिली सात-सात साल की सजा

यंगून। म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय पर सेना की बर्बरता को दिखाने वाले दो पत्रकारों को यहां की कोर्ट ने सजा सुनाई है। इन पत्रकारों को सजा दिए जाने की पूरी दुनिया में निंदा हो रही है। गौरतलब है कि म्यांमार की अदालत ने सोमवार को रॉयटर्स न्यूज एजेंसी के दो पत्रकारों वा लोन (32) और क्याव सो ऊ (28) को 7-7 साल की सजा सुनाई है। जज ये लविन ने कहा कि दोनों ने म्यांमार के गोपनीयता कानून को तोड़कर रोहिंग्या मामले की रिपोर्टिंग की। फैसले को मीडिया की आजादी पर हमला करार दिया जा रहा है। लोन और ऊ को दिसंबर 2017 में हिरासत में लिया गया था। उस दौरान दोनों जर्नलिस्ट रखाइन राज्य में हो रही रोहिंग्या मुसलमानों की हत्याओं की जांच कर रहे थे। फैसला आने के बाद क्याव ने कहा कि अदालत ने जो निर्णय सुनाया,हमें उससे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं है। हमने कुछ भी गलत नहीं किया।

मानवाधिकार संगठन ने जताई नाराजगी

रॉयटर्स के एडिटर-इन-चीफ स्टीफन एडलर के मुताबिक उनके रिपोर्टर्स को दोषी ठहराया जाना संगठन, उन दोनों लोगों और दुनिया की हर प्रेस के लिए दुखद है। इस मामले को लेकर मानवाधिकार संगठन ने भी नाराजगी जताई है। ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया डायरेक्टर फिल रॉबर्टसन ने ट्वीट कर बताया कि रॉयटर्स के दो रिपोर्टर्स को दोषी करार दिया जाना म्यांमार में प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। ये दिखाता है कि खोजी पत्रकारिता से म्यांमार सरकार किस तरह डरती है। लोन और ऊ को जुलाई में गोपनीयता कानून तोड़ने का दोषी पाया गया था। इसके तहत अधिकतम 14 साल की सजा हो सकती थी।

देश छोड़ने पर मजूबर हुए रोहिंग्या

दोनों पत्रकारों की रिपोर्ट में रोहिंग्या पर हुए अत्याचार की व्याख्या की गई है। इसमें बताया गया है कि किस तरह यहां की सेना ने रोहिंग्या को निकालने के लिए दमन की नीति अपनाई। उन्होंने रोहिंग्या का कत्लेआम करना शुरू कर दिया। पूरी की पूरी बस्ती उजाड़ डाली गई। रोहिंग्या मुस्लमानों को मजबूर होकर देश छोड़कर भागना पड़ा। वे शरणार्थियों की तरह अब भी कैंपों में रहने को मजबूर हैं।