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अब कोहरे के कारण ट्रेनें नहीं होगी लेट, रेलवे ने उठाया यह कदम

इस साल से कोहरे के दौरान ट्रेनें नहीं लेट होगी। इसके लिए रेलवे ने यह कदम उठाया है।

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 train will not delay due to fog

मुरादाबाद। ठंड शुरू होने वाली है। आने वाले कुछ दिनों में कोहरे लगने शुरू हो जाएंगे। ऐसे में सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना पड़ता है ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को, क्योंकि कोहरे के कारण अक्सर ट्रेनों की रफ्तार कम हो जाती है। खासकर उत्तर भारत में, जहां कोहरे के कारण ज्यादातर ट्रेन समय से घंटों लेट चलती है। लेकिन, इस साल से कोहरे से निपटने के लिए रेलवे ने बड़ा कदम उठाया है। जी हां, कोहरे से निजात पाने के लिए रेलवे ने फोगवेस डिवाइस तैयार की है, जिसे लोको पायलट अपने साथ लेकर चलेंगे।

मुरादाबाद के एडीआरएम संजीव मिश्रा ने बताया कि कोहरे के कारण हर साल ट्रेनों का संचालन प्रभावित हो जाता है। इससे निजात पाने के लिए रेलवे ने फोगवेस डिवाइस तैयार किया है, जिसे लोको पायलट अपने साथ लेकर चलेंगे। उन्होंने बताया कि प्रयोग के तौर पर कुछ ट्रेनों में यह सिस्टम काम कर रहा था। लेकिन, अब सभी लोको पायलेट इसे अपने साथ लेकर चलेंगे ताकि यात्रियों को समय से उनके गंतव्य स्थान तक पहुंचाया जा सके। संजीव मिश्रा ने बताया कि इस बाबत सभी लोको पायलट को निर्देश दे दिए गए हैं कि वे रनिंग रूम से डिवाइस लेकर ही ट्रेन में चढ़ें।

एडीआरएम ने बताया कि जीपीएस आधारित किट ट्रेन को समयबद्ध और सुरक्षित चलाने में मददगार होगा। ट्रेनों को समयबद्ध और सुरक्षित करने की दिशा में यह प्रयोग लागू कर दिया गया है। पहले कोहरे के दौरान इस सिस्टम को चुनिंदा ट्रेनों में ही लगाया जाता था। अब सभी ट्रेनों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया है। इस महीने के आखिर से ही यह सिस्टम काम करने लगेगा। मंडल में कोहरा के दस्तक के पहले ही इसे सभी ट्रेनों में अनिवार्य कर दिया गया है।

यह डिवाइस पायलट को रूट की हर जानकारी से रू-ब-रू कराएगी। मसलन, ट्रेन के चलने के साथ ही सिग्नल की लोकेशन, रेलवे पुल, क्रासिंग और स्टेशन की दूरी की जानकारी पायलट के सामने दिखेगी। सिस्टम, सुरक्षा के लिहाज से इस तरह की सूचनाओं का प्रसारण भी करता रहेगा, जिससे पायलट को इस बात की जानकारी हो जाएगी कि सिग्लन कितनी दूर है। इससे ट्रेन फुल स्पीड चलाने में पायलट को दिक्कत नहीं होगी। कोहरे में भी ट्रैक की पूरी जानकारी पायलट के पास रहेगी। बता दें कि पिछले पांच साल से इस प्रणाली का परीक्षण चल रहा था। फिलहाल, कुछ ट्रेनों को इस डिवाइस के जरिए चलाया जा रहा था।