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Once Upon a Time: मुगलों ने बनवाई थी शहर की जामा मस्जिद, कई कहानियां अपने अंदर छिपाए है ये मस्जिद

मस्जिद परिसर में एक साथ दस हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं। सामने के पार्क व अन्य स्थानों को मिलाकर 70 हजार से अधिक लोग विशेष दिनों में यहां नमाज अदा करते हैं।

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मुरादाबाद: पूरी दुनिया में पीतल नगरी के नाम से मशहूर मुरादाबाद भी बड़ा इतिहास अपने अंदर समेटे है। जिसमें शहर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद भी शामिल है। मुगलकालीन इस मस्जिद की सबसे ख़ास बात है वो ये कि ये अकेली ऐसी मस्जिद है जो नदी के किनारे है। कहते हैं कि कभी रामगंगा में इतना पानी होता था कि नमाज पढ़ने वाले नदी के पानी से वजू कर लेते थे।

रामगंगा नदी किनारे स्थित जामा मस्जिद अपने अंदर चार सौ सालों का इतिहास समेटे हैं। इसका विशाल भवन प्राचीन मुगलकालीन स्थापत्य कला व आधुनिक निर्माण शैली का अद्भुत संगम है। मस्जिद परिसर में एक साथ दस हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं। सामने के पार्क व अन्य स्थानों को मिलाकर 70 हजार से अधिक लोग विशेष दिनों में यहां नमाज अदा करते हैं।

तत्कालीन मुगल शासक शाहजहां के वजीर रुस्तम खां ने 1637 इसवी में रामगंगा नदी के किनारे इस मस्जिद का निर्माण कराया था। उन्होंने मस्जिद की तीन दरों को बनवाया था, इसमें पूरी तरह मुगलकालीन स्थापत्य कला का प्रयोग किया गया था। बाद में किसी कारण से रुस्तम खां यहां से चले गए और यह मस्जिद बंद व वीरान हो गई। कालांतर में शहर के सय्यद आलिम अली दीनी तालीन के लिए दिल्ली गए। वर्ष 1838 में उनके उस्ताद मोहम्मद शाह इशाक देहलवी के निर्देश पर दीनी प्रचार-प्रसार को वो वापस मुरादाबाद आए तब उनकी नजर मस्जिद पर पड़ी। इसके बाद उन्होंने जामा मस्जिद खुलवाई व उसे आबाद कराया। सय्यद आलिम अली ही इस जामा मस्जिद के पहले इमाम बने।


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