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करोड़ों खर्च फिर भी आग नहीं बुझा पा रहा सिस्टम, दो बार लगी आग, लाखों की क्षति

जिला अस्पताल में फायर सिस्टम की जांच के लिए एक साल पहले भी गठित की थी समिति, उस मामले अभी तक नहीं हो सकी कार्रवाई

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मुरैना. जिला अस्पताल में फायर सिस्टम को स्थापित करने में करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं, उसके बाद भी कोई इनपुट निकल नहीं आ रहा है। सिस्टम पूरी हर ऑटोमैटिक है, उसके लगने के बाद भी एक साल मे दो बार आग लग चुकी है, जबकि ये सिस्टम इसलिए लगवाए थे कि आग पर काबू पाने में सार्थक होंगे लेकिन ये दोनों बार कारगर साबित नहीं हो सके। इससे लगता है कि सिस्टम को स्थापित करने में कार्य की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया इसलिए बार- बार आग लग रही है और उस आग को सिस्टम डिडेक्ट नहीं कर पा रहा है।
यहां बता दें कि करीब 1.70 करोड़ की लागत से पुरानी बिल्डिग और इससे अधिक राशि से अस्पताल की नई बिल्डिंग में सेंसरयुक्त ऑटोमैटिक फायर सिस्टम, इसी उद्देश्य को लेकर स्थापित किया था कि भविष्य में अगर बिल्डिंगों में कहीं भी आग लगती तो सिस्टम में लगे डिडेक्टर धूंआ को डिडेक्ट करेंगे क्योंकि ये एक दूसरे सेंसर के द्वारा कनेक्ट हैं, उसके बाद फायर अलार्म बजेगा और नोजल से स्वतह ही पानी स्प्रे होना शुरू हो जाएगा। लेकिन आग लगने पर सिस्टम काम नहीं कर रहा है।

इन उदाहरणों से जानिए, सिस्टम की स्थिति

03 जनवरी को जिला अस्पताल के नई बिल्डिंग स्थित एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में आग लगी थी उस समय भी सिस्टम ने काम नहीं किया और स्टाफ ने अग्निशमन यंत्रों के सहारे आग पर काबू पाया था। वहां वार्ड में भर्ती 50 बच्चों की जान पर आन बनी थी लेकिन स्टाफ की सक्रियता उन बच्चों को बगल वाले वार्ड में शिफ्ट किया। और अस्पताल में मौजूद अग्निशमन यंत्र से आग पर काबू पाया।

16 अप्रैल को जिला अस्पताल को सर्जीकल विभाग के ऑपरेशन थियेटर के बरामदे में आग लगी, तेज धूंआ के साथ लौ निकलने लगी। यहां ऑटोमैकिट सिस्टम होने के बाद भी काम नहीं किया। यहां न तो डिडेक्टर ने धूंआ डिडेक्ट किया और न फायर अलार्म बजा। स्टाफ ने अस्पताल में मौजूद अग्निशमन यंत्रों की मदद से आग पर काबू पाया जा सका। अगर स्टाफ अलर्ट नहीं होता तो बड़ा हादसा हो सकता था। सिस्टम को लेकर अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

गणेशी हॉस्पीटल में मिला एक्सपायरी डेट का अग्निशमन

अस्पतालों में आए दिन हो रही आगजनी की वारदातों को लेकर शासन ने प्राइवेट व सरकारी अस्पतालों में मॉकड्रिल करवाने के निर्देश दिए हैं। इसी के तहत मंगलवार को सीएमएचओ ने दो प्राइवेट अस्पतालों में मॉक ड्रिल करवाकर स्टाफ को बताया कि अगर आग लगती है तो उसको किस तरह बुझाया जाए। इस दौरान गनेशी हॉस्पीटल में एक अग्निशमन यंत्र एक्सपायरी डेट का मिला और जो लगे थे, वह बिल्डिंग को देखते हुए कम संख्या में थे, इसके अलावा अन्य अव्यवस्थाएं भी मिलीं। सीएमएचओ ने सिलेंडर को बदलने और संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए। कुछ और भी असुविधाएं मिलीं, जिनके सुधार के निर्देश दिए गए।

कमेटी करेगी फायर सिस्टम का ऑडिट

जिला अस्पताल में लगातार आगजनी की घटनाएं होना और फायर सिस्टम द्वारा काम न करने के मामले को प्रशासन ने गंभीरता से लिया है। कलेक्टर ने एक कमेटी गठित की है, जो फायर सिस्टम की ऑडिट करेगी। जिसमें यह देखा जाएगा कि आखिर ये सिस्टम काम क्यों नहीं कर रहा है।

सीएमएचओ डॉ. पदमेश उपाध्याय से सीधी बात

पत्रिका: जिला अस्पताल में फायर सिस्टम स्थापित करने में करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं लेकिन काम नहीं कर रहा।
सीएमएचओ: सिस्टम तब काम करता है जब तापमान 56 डिग्री पर होगा। इस बार जो आग लगी थी, वह टीनशेड (बरामदे) में लगी थी, वहां सिस्टम नहीं था, जब वार्ड में पहुंची तो पता चल गया था।
पत्रिका: आग लगने पर हर बार जांच समिति बनाई जाती है लेकिन कार्रवाई नहीं होती, क्यों।
सीएमएचओ: हर घटना के बाद जांच समिति बनती है और बनाना भी चाहिए, उससे सुधार होता है, छोटी-छोटी कमियों को दूर किया जाता है।
पत्रिका: आग लगने पर अस्पतालों में क्या प्रबंध किए गए हैं।
सीएमएचओ: हर प्राइवेट व सरकारी अस्पतालों में मॉक ड्रिल कराई जा रही है, स्टाफ को बता रहे हैं कि आग लगने पर प्रथम दृष्टया क्या कर सकते हैं।