27 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

देश में प्रसिद्ध है चंबल की मिठास, दूर-दूर तक है मुरैना की गजक के दीवाने

देश के कई हिस्सों में लोग मुरैना की गजक को खाना ही पंसद करते हैं

3 min read
Google source verification

मुरैना

image

monu sahu

Jan 13, 2020

 gajak of morena in madhya pradesh special story

देश में प्रसिद्ध है चंबल की मिठास, दूर-दूर तक है इसके दीवाने

मुरैना। देश-विदेश में अपने अनूठे स्वाद के लिए प्रसिद्ध मुरैना की गजक का नाम ही काफी है। प्रदेश के चंबल जिले के मुरैना में निर्मित इस गजक का बेजोड़ स्वाद यहां के पानी की खास तासीर का ही नतीजा है,तभी तो देश के कई हिस्सों में ज्यादातर लोग मुरैना की गजक को खाना ही पंसद करते हैं। ऐसे में हम आपको बताने जा रहे है कि आखिर मुरैना की गजक क्यो प्रसिद्ध है। मुरैना की गजक की लोकप्रियता का यह आलम है कि अच्छी बिक्री के लिए बाहर के व्यापारी मुरैना की गजक को हर हाल में अपने पास रखना चाहते है। इतना ही नहीं अन्य पैकेट पर भी मुरैना की गजक ही लिखवाते हैं। मूल रूप से गुड़ और तिल (तिल्ली) से बनने वाली यह मिठाई समय के साथ अब कई तरह के स्वाद में मिलने लगी है।

देश ही नहीं विदेशों में भी है प्रदेश की इस गजक की पहचान, पानी की है तासीर

घंटों कूटते हैं कारीगर तब बनती है गजक
मुरैना की गजक स्वाद के मामले में जितनी बेजोड़ होती है, उतनी ही मेहनत इसे बनाने में लगती है। इसकी बड़ी विशेषता इसका खस्ता (कुरकुरा) होना है। बड़े से कड़ाह में गुड़ की चासनी बनाई जाती है। इसे फेंटकर आधा इंच की परत में बदला जाता है। इतना ही नहीं इसके ऊपर कूटा हुआ तिल बिछाया जाता है और कई कारीगर लकड़ी के हथौड़े से इसे घंटों तक कूटते हैं। गुड़ और तिल की तब तक कूटाई की जाती है जब दोनों आपस में पूरी तरह मिल न जाएं। फिर इसे ट्रे में रखकर काटा जाता है। इसे और अच्छा स्वाददार बनाने के लिए इसमें सूखे मेवे का भी उपयोग होने लगा है।

15 जनवरी से फिर आएगा मौसम में बदलाव आएगा, बढ़ेगी सर्दी

आजादी के साथ ही बाजार में बिकने आई गजक
मुरैना में गजक का सफर करीब सात दशक पहले आजादी के साथ ही शुरू हुआ था। गजक के पुराने कारीगर वयोवृद्ध खान साहब बताते है कि पहले गजक गुड़,तिल और बाजरे की तिलकुटिया के तौर पर घरों में ही बनती थी। बाजार से इसका संबंध नहीं था, इसकी दुकानें नहीं हुआ करती थीं। 1947 के आसपास ही कुछ हलवाइयों ने बाजरे को हटाकर सिर्फ कूटे हुए तिल और गुड़ की पट्टियां बेचना शुरू की। इस तरह गजक का जन्म हुआ। धीरे-धीरे तिलकुटिया गजक बन गई और देशभर में पहुंचने लगी। प्रसिद्धि बढ़ी तो आगरा, अलीगढ़, जयपुर और दौसा (राजस्थान) के कारीगरों ने भी इसे बनाना सीखा, लेकिन चंबल के पानी की तासीर से बनी स्वादिष्ट गजक मुरैना में ही बनती-बिकती रही। बाद में इसका स्वाद देश और विदेश में भी प्रसिद्ध हो गया।

यह चल रहे हैं गजक के रेट
गुड़ व शक्कर की पट्टी (260 रुपए),स्पेशल तिली बर्फी,काजू पट्टी,काजू रोल (480 रुपए), ड्रायफू्रट समोसा (500 रुपए), गजक फैनी, सोहन गजक (480 रुपए ), चॉकलेट बर्फी (340 रुपए), तिली ड्रायफ्रूट लड्डू (600 रुपए) मूंगफली चिक्की (240 रुपए), ड्रायफ्रूट चिक्की(600 रुपए) सभी भाव प्रति किलो।

गजक के दीवाने है लोग
मध्यप्रदेश के चंबल जिले के मुरैना की गजक का स्वाद सौ साल पुराना है। सालभर और सबसे अधिक सर्दियों के मौसम में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाली गजक देश में ही नहीं विदेशों तक खास डिमांड रहती है। आगरा, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद, कलकत्ता, भोपाल, इंदौर के अलावा अमेरिका, सिंगापुर, दुबई, श्रीलंका आदि देशों तक लोग इसके स्वाद के दीवाने हैं।

पानी की तासीर का है नतीजा
गजक के बड़े बड़े दुकानदार बताते है कि मुरैना में निर्मित गजक का बेजोड़ स्वाद यहां के पानी की खास तासीर का ही नतीजा है। तभी तो देश के कई हिस्सों में मुरैना के कारीगर गजक बनाने जाते हैं, लेकिन यहां तैयार होने वाली गजक के जैसा स्वाद नहीं आता। इसलिए अब गजक तैयार करने के लिए मुरैना का पानी भी देश के विभिन्न हिस्सों में मंगाया जाने लगा है। साथ ही ज्यादातर लोग मुरैना की गजक को खाना ही पंसद करते हैं।