
यहां की गजक का स्वाद बेमिशाल है, जानिए कैसे तैयार होती है मुंह में घुल जाने वाली गजक
मुरैना। गजब है, यह तो गजक है मिठास में, यह तो अजब है, चलिए कुछ मीठा हो जाए, मीठा भी ऐसा जो सेहत और स्वाद दोनों बढ़ाए। इस खास तरह के मीठे के लिए आपको रुख करना होगा ग्वालियर-चंबल का। यहां मिठास घुली है एक खास तरह की मिठाई में, जो गजक के नाम से मशहूर है। गजक से मुरैना का और मुरैना से गजक के अटूट रिश्ते ने इसे राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही पहचान दिलाई है। मुरैना की गजक का स्वाद बेमिशाल है, यही वजह है कि इसका डुप्लेकेट उपलब्ध नहीं है।
खासियत यह भी है कि मुरैना के अलावा कहीं ऐसी गजक बन ही नहीं पाती। गजक को विशिष्टता चंबल के पानी से ही मिली। इसलिए राज्य सरकार ने भी इसकी खास अंदाज में ब्रांडिंग का ऐलान किया है। इसके लिए 6 और 7 दिसंबर 2019 को 'गजक मीठोत्सव-2019Ó का आयोजन किया जा चुका है। अब इसे प्रदेश के प्रमुख हवाई अड्डों पर उपलब्ध कराने की दिशा में राजनीतिक और प्रशासनिक प्रयास किए जा रहे हैं। कारोबारी मानते हैं इससे गजक कारोबार को आगे ले जाने में मदद मिलेगी। जिले में गजक कारोबार 75 साल पुराना है। जिले में गजक का कारोबार करने वाले व्यापारियों की संख्या 1000 के आसपास है। 2000 के करीब लोग इसके निर्माण और खुदरा बिक्री से भी जुड़े हैं। प्रतिदिन जिले में 50-60 क्विंटल से गजक की खपत होती है।
मकर संक्रांति पर बंपर बिक्री
मुरैना शहर में ही 250 के करीब कारोबारी हैं। ठेलों पर गुमटियों पर कारोबार करने वाले इसमें शामिल नहीं है। ऐसे में रोजाना 6000 किलो तक गजक की बिक्री होती है। 300 रुपए से यह कारोबार रोजाना 18 लाख रुपए से अधिक का होता है। एक माह में 5 करोड़ से ज्यादा का कारोबार होता है। चार माह में केवल मुरैना शहर से 20-22 करोड़ का व्यवसाय होता है। जिले में भी 10-15 करोड़ का कारोबार होता है।
स्वाद और खस्तापन में चंबल के पानी की महिमा
गजक की श्रेष्ठता का श्रेय चंबल के पानी को ही है। 75 साल पहले जब गजक कारोबार की शुरूआत हुई तब कड़क और मोटी पपड़ी बनती थी। गुड़ और तिल को मिलाकर बनने वाली गजक की जब मांग बढऩे लगी तो गुड़ की गजक बननी शुरू हुई। निखार के लिए शक्कर की गजक भी भी खस्ता पपड़ी के तौर पर बनने लगी। खस्तापन का सूत्र भुनी हुई गजक और गुड़ की चासनी के मिश्रण को कूटने की कला पर निर्भर है।
मीठोत्सव से बढ़ी पहचान और मांग
मुरैना की गजक से मप्र सरकार तक प्रभावित है। इसीलिए बजट सत्र 2019 में इसकी ब्रांडिंग का ऐलान किया। इसी कड़ी में कलेक्टर प्रियंका दास के प्रयासों से 6 व 7 दिसंबर 2019 को गजक मीठोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें ब्रांडिंग के लिए खास तौर से तैयार लोक नाटक, लोकगीत और लोकनृत्य सहित उसके इतिहास पर प्रकाश डाला गया। गजक मीठोत्सव और इसमें पहली बार कवियत्री सम्मेलन का भी आयोजन किया गया।
मुंह में घुल जाने वाली गजक
बढिय़ा गजक के लिए अच्छा गुड़ और तिली पहली शर्त है। बराबर मात्रा में गुड़ और तिल का मिश्रण तैयार होता है। गुड़ की चासनी भट्टी पर बनाई जाती है और तिल को कढ़ाई में भूना जाता है। दोनों में 8-10 मिनट का समय लगता है। गुड़ की चासनी को एक पत्थर की सिल पर डालकर ठंडा किया जाता है। इस पेस्ट को फेंटने के बाद तिली मिलाकर पहले हाथ से मिलाते हैं। इस मिश्रण को पत्थर की सिल पर फैलाकर लकड़ी के हथौड़ों से कूटा जाता है। इससे तैयार होने वाली पट्टी को कटर से काट लिया जाता है।
Updated on:
14 Jan 2020 08:50 pm
Published on:
14 Jan 2020 07:16 pm
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