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आकाशवाणी होते ही विचलित हो गया था कंस

- श्रीमद भागवत कथा में पं. सुभाष शास्त्री ने सुनाई भगवान के जन्म की कथा

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आकाशवाणी होते ही विचलित हो गया था कंस

आकाशवाणी होते ही विचलित हो गया था कंस

मुरैना. श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिवस में पं. सुभाष शास्त्री गुढ़ा वाले ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा को विस्तार से सुनाया। शास्त्री ने बताया कि आहुक के देवक और उग्रसेन दो पुत्र थे। देवक के देवमान आदि चार पुत्र व सात पुत्रियां थी। इन्हौने इस सातों पुत्रियों का विवाह शूरसेन के पुत्र वसुदेव जी के साथ कर दिया था। उग्रसेन के कंस आदि नौ पुत्र व पांच पुत्रियां थी। कंस अपनी चचेरी ***** देवकी से बहुत प्रेम करता था। जब देवकी का वसुदेव के साथ विवाह हुआ। देवकी की विदाई के समय कंस रथ हांक रहा था उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे अभागे कंस, तू जिस देवकी का रथ हांक रहा है, उसी का अष्टम गर्भ तेरा काल होगा। कंस ने आकाशवाणी सुनते ही रथ रोका, और देवकी को मारने के लिए केश पकड़ लिए। तब वसुदेव जी ने कहा कि ये तुम्हारी बहन है इसे मत मारो। इसका अष्टम गर्भ ही तो तुम्हारा काल है। मैं आपको वचन देता हूं कि इसकी होने वाली समस्त सन्तान तुम्हें दे दूंगा। कंस ने इनको छोड़ दिया। समयान्तर में देवकी ने एक पुत्र को जन्म दिया, कीर्तिमान उसका नाम था वसुदेव जी उस बालक को कंस के पास लेकर आये। कंस ने कहा कि इस बालक से मुझे कोई भय नहीं है। भय तो मुझे आठवे गर्भ से है। वसुदेव उस बालक को लेकर घर चले गए। उधर कंस के यहां नारद जी आ गए और कंस से कहने लगे कि हे कंस तुम जानते नहीं हो, तुमने देवकी के उस बालक को मारा क्यों नहीं। तब कंस ने नारद जी से कहा कि आकाशवाणी के अनुसार देवकी का अष्टम गर्भ मेरा काल है, पहला तो नहीं। तब नारद जी ने आठ रेखाएं खींच कर प्रत्येक रेखा आठवी सिद्धि कर दी और देवकी के परम पुत्र कीर्तिमान को कंस के द्वारा मरवा दिया। इस प्रकार से कंस ने देवकी के छ: पुत्रों का वध कर दिया। सातवे गर्भ के रूप में बलदाऊजी पधारे। भगवान ने योगमाया के द्वारा गोकुल में रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया।
चतुर्भज रूप में प्रकट हुए भगवान
आठवे गर्भ के रूप में स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी पधारे। देवताओं ने भगवान की गर्भ स्तुति की। तत्क्षण भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के ठीक बारह बजे कंस की कारागार में चतुर्भुज रूप में भगवान का प्राकट्य हुआ। तब वसुदेव और देवकी ने भगवान की स्तुति की और द्विभुज स्वरूप में आने को कहा। तब भगवान ने इनसे कहा कि पूर्व जन्म में आपने मुझे पुत्र रूप में मांगा था। मैं इसलिए आपके यहां पुत्र बन कर आया हूं। अब आप मुझे गोकुल नंद जी के यहां छोड़ आइए और वहां से यशोदा जी के यहां हुई लडक़ी को यहां ले आए। तब वसुदेव जी ने ऐसा ही किया।
नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
उधर गोकुल में प्रात:काल देखा तो यशोदा जी के बगल भगवान श्रीकृष्ण जी सो रहे थे। जब इस बात का नन्द बाबा व समस्त ब्रजवासियों को पता लगा तो सभी नन्द महल आ गये और धूम धाम से नन्दोत्सव मनाया गया और सभी लोग नन्द के घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की गाने लगे। सभी ब्रजवासी प्रशन्न हो रहे थे। कथा का आयोजन महिला भक्त मंडल मुरैना द्वारा रामेश्वरम तमिलनाडु में किया जा रहा है।