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Review Chhapaak: ख़ूबसूरती से बनाई गई एक संवेदनशील फिल्म ‘छपाक’

फ़िल्म में लक्ष्मी की कहानी को अतीत और वर्तमान के ज़रिए दर्शाया गया है। छपाक में न केवल एक एसिड अटैक सर्वाइवर के दर्द, मेडिकल प्रक्रिया को दिखाया है, बल्कि ऐसे ....

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Chhapaak

Chhapaak

फिल्म: छपाक

निर्माता: दीपिका पादुकोण, मलय प्रकाश, मेघना गुलज़ार

निर्देशक: मेघना गुलज़ार

कलाकार: दीपिका पादुकोण, विक्रांत मेसी और अंकित बिष्ट

रेटिंग: 3/5


अरुण लाल


आप और हम फ़िल्म क्यों देखने जाते हैं? आप कहेंगे मनोरंजन के लिए। पर जब आप मेघना गुलज़ार की फ़िल्म देखते हैं तब आप समाजिक सरोकार को पर्दे पर चरितार्थ होने की उम्मीद में जा सकते हैं। 'राज़ी' और 'तलवार' की इस क़ाबिल डायरेक्टर ने फ़िल्म 'छपाक' से इस बार एसिड अटैक जैसे सब्जेक्ट पर बात करने की ठानी है। अमूमन ऐसी ऑफ बीट सी लगने वाली सिनेमा में कलाकारों के चयन में काफ़ी माथापच्ची की जाती है। ऐसे में दीपिका पादुकोण जैसी सुपरस्टार को मुख्य भूमिका के लिए चुनना अपने आप में बड़ी बात थी। बड़े पर्दे के विस्तार के लिहाज से काफी असहज करने वाली यह फ़िल्म बड़ी सहजता से समाज को आईना दिखाती है। और इस घिसी-पिटी बात को वाकई मायने देती है कि सिनेमा समाज का चेहरा होता है।

कहानी
छपाक कहानी है एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल। मेघना ने मुख्य किरदार का नाम लक्ष्मी से बदलकर मालती कर दिया है, पर कहानी उन्हीं की ही है। लक्ष्मी से हम सभी परिचित हैं, उस बहादुर महिला के तौर पर जिसने ना सिर्फ अपने दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी बल्कि एसिड की खुली बिक्री के खिलाफ भी कानून में संशोधन करवाने की वजह बनी।

फ़िल्म में लक्ष्मी की कहानी को अतीत और वर्तमान के ज़रिए दर्शाया गया है। छपाक में न केवल एक एसिड अटैक सर्वाइवर के दर्द, मेडिकल प्रक्रिया को दिखाया है, बल्कि ऐसे मामलों में आनेवाली कानूनी अड़चनों को उतने ही करीब से दिखाया है। हालांकि फ़िल्म ओवरऑल बेहद संवेदनशील और ज़रूरी है, पर सिनेमाई दृष्टि से इसका फर्स्ट हाफ थोड़ा स्लो है, जो किन्हीं किन्हीं दर्शकों को बोर कर सकता है। हालांकि जब सेकेंड हाफ में कहानी रफ्तार पकड़ती है, तब वह तेज़ ही नहीं, ऊंची भी उठ जाती है। फ़िल्म की खासियत यह है कि संवेदनशील मुद्दे को बहुत ही सिंपल तरीके से कहा गया है, कहीं भी गैरज़रूरी भाषणबाजी नहीं हुई है, ना ही उपदेश दिया गया है।फ़िल्म का ट्रीटमेंट डॉक्यू ड्रामा अंदाज़ में किया गया है, जो कि सब्जेक्ट को देखते हुए ज़ाहिर भी था।

एक्टिंग और डायरेक्शन
अलहदा कहानी ही किसी फिल्म को उठाने के लिए काफी नहीं होती। इस बात को दीपिका पादुकोण से बेहतर भला कौन समझ सकता था। उन्होंने इस फ़िल्म में अपने अब तक के करियर के सबसे बेहतरीन अभिनय में से एक किया है। मालती के किरदार के दर्द, खुशी, हिम्मत, संकोच सबको उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत किया है। दीपिका का पूरा-पूरा साथ दिया है, विक्रांत मेसी ने। उन्होंने ज़बर्दस्त परफॉर्मेंस किया है। बाकी के सपोर्टिंग किरदारों का भी काम अच्छा ही रहा है। फ़िल्म का गीत संगीत कहानी के मुताबिक है। संवाद तो अंदर तक छू जाते हैं। गुलज़ार के गाने भी गज़ब संवेदनशीलता लिए हुए हैं। पूरा का पूरा पैकेज आपको बेहतरीन इंसान बनने के लिए प्रेरित करेगा।

क्यों देखें
सार्थक सिनेमा देखने की चाह रखने वालों के लिए यह ख़ूबसूरती से बनाई गई एक संवेदनशील फ़िल्म है। अगर आप शुद्ध मसाला मूवी प्रेमी हैं तो आपको शायद इतनी अच्छी न लगे। हमें फ़िल्म को न देखने का कोई और कारण समझ में नहीं आता, हां आप दीपिका का विरोध करने के लिए फ़िल्म न देखना चाहें तो अलग बात है। पर यह देखने जैसी फ़िल्म है।