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129 फल-सब्जियों को मिला जीआइ टैग, अकेले महाराष्ट्र के 26, महोबा का पान और बिहार का मघई भी शामिल

नासिक का अंगूर, अलीबाग का प्याज, हापुस, इलाहाबादी अमरूद, मलीहाबादी दशहरी और प. बंगाल का माल्दा और फजली आम शामिल

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129 फल-सब्जियों को मिला जीआइ टैग, अकेले महाराष्ट्र के 26, महोबा का पान और बिहार का मघई भी शामिल

129 फल-सब्जियों को मिला जीआइ टैग, अकेले महाराष्ट्र के 26, महोबा का पान और बिहार का मघई भी शामिल

मुंबई. क्षेत्र विशेष में होने वाली कृषि उपजों की भौगोलिक पहचान बताने वाले जीआइ टैग के तहत देश में अब तक 129 फल-सब्जियां, मसाले और अन्य उत्पाद पंजीकृत किए गए हैं। इनमें कश्मीरी केसर, दार्जिलिंग चाय, केरल की मलाबार मिर्च, बिहार का मघई सहित महोबा का पान, बीकानेरी भुजिया, अलीबाग का सफेद प्याज, भागलपुर का जर्दालू, नागपुर के संतरे, नासिक का अंगूर आदि शामिल हैं।

आम की कई किस्मों को जीई टैग मिला है, जिनमें मलीहाबादी केसर, कोंकण का हापुस, पश्चिम बंगाल के माल्दा और फजली शामिल हैं। बागवानी में अग्रणी महाराष्ट्र को 26 जीआइ टैग मिले हैं। सांगली का किशमिश, कोल्हापुर का गुड़, सोलापुर की जवारी, नवापुर की तूर दाल, पुरंदर का अंजीर जैसी कई उपजें गिनाई जा सकती हैं। जीआइ टैग की सूची में बंगाल का रसगुल्ला और तिरुपति के लड्डू को भी स्थान मिला है। देश में सबसे पहले दार्जिलिंग चाय को जीआइ टैग मिला था।

जीआइ टैग के कई फायदे हैं। इससे क्षेत्र विशेष में होने वाली उपज की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। घरेलू और विदेशी ग्राहकों का ऐसे उत्पादों की गुणवत्ता पर भरोसा होता है। पहले लोग जीआइ टैग पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। लेकिन, हाल के वर्षों में इसकी ओर रुझान बढ़ा है। हर राज्य अपने यहां की खास उपज के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता है। सहाकारी संस्था के माध्यम से किसान जीआइ टैग के लिए आवेदन कर रहे हैं। महाराष्ट्र के लासगांव प्याज को पहले से जीआइ टैग मिला था। अलीबाग के सफेद प्याज को पिछले साल चिन्हित किया गया है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और जम्मू व कश्मीर को बासमती चावल का जाआई टैग मिला है। गोवा की फेनी, नागालैंड की नागा मिर्च, कुर्ग संतरा, नाजनगुड और जलगांव का केला, महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी, गुजरात का भालिया गेहूं, गिर का केसर आम, कर्नाटक का गुलाबी प्याज जैसी उपजों को जीआइ टैग मिल चुका है। बिहार की शाही लीची और कतरनी चावल भी इसमें शुमार हैं।

जीआइ टैग की प्रक्रिया
वाणिज्य मंत्रालय के तहत काम करने वाले कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स, डिजाइंस एंड ट्रेड माक्र्स के पास आवेदन किया जाता है। उत्पाद की खूबियों की जांच और तथ्यों को परखने के बाद जीआइ टैग मिलता है। जीआई टैग 10 साल के लिए वैध होता है। बाद में इसका नवीनीकरण कराना पड़ता है।

आय बढ़ाने में सहायक
जीआइ टैग मिलने के बाद संबंधित क्षेत्र के उपज की मांग बढ़ जाती है। बिक्री बढऩे से किसानों की आय बढ़ती है। ग्राहकों की मांग पूरी करने में व्यापारियों को सहूलियत होती है। सीधे किसानों-सहकारी या निजी संस्थाओं से उपज खरीदी जा सकती है। विदेशी बाजार में यह ट्रेडमार्क की तरह काम करता है।