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एक गौशाला ऐसी जो बनेगी पर्यटन का केंद्र

सराहनीय: कृषि क्षेत्र में रिसर्च को समर्पित कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर की पहलदेसी गायों के रिसर्च सेंटर में खुलेगा पर्यटन केंद्र, यहां आ सकते हैं देश-विदेश के सैलानीबायोगैस प्लांट से मिलेगी बिजली, गो मूत्र-गोबर से बनाएंगे उत्पादसाहीवाल, गीर, राठी, थारपारकर, लाल सिंधी जैसी गायें रखी जाएंगी

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एक गौशाला ऐसी जो बनेगी पर्यटन का केंद्र

एक गौशाला ऐसी जो बनेगी पर्यटन का केंद्र

पुणे. कृषि क्षेत्र में रिसर्च को समर्पित कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर (पुणे) की ओर से सराहनीय पहल की गई है। शहर के शिवाजी नगर स्थित कॉलेज परिसर में देसी गायों के लिए गौशाला बनाई जाएगी जिसमें पर्यटन केंद्र tourist center भी होगा। छात्र-विशेषज्ञ व्यापक शोध के आधार पर पशु पालकों, डेयरी कारोबारियों को बताएंगे कि देसी गायों के पालन से किस तरह ज्यादा कमाई कर सकते हैं। यहां गायों के लिए पौष्टिक चारे का इंतजाम किया जाएगा। दूध प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाएगी। औषधीय पौधे लगाए जाएंगे और होम्योपैथी उपचार homeopathy treatment की व्यवस्था होगी। गोमूत्र-गोबर से विभिन्न उत्पाद बनाने और सौर ऊर्जा solar energy व बायोगैस प्लांट biogas plant से बिजली हासिल करने जैसी प्रशिक्षण सुविधाएं जुटाई जाएंगी। देश-दुनिया country and world के सैलानी यहां देसी गायों desi cows की प्रमुख नस्लों के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं।
कॉलेज के कुलपित डॉ. प्रशांत कुमार पाटिल ने बताया कि कॉलेज की गौशाला में हम पौष्टिक दूध Milk के लिए मशहूर साहीवाल, गिर, राठी, थारपारकर और लाल सिंधी गायें रखेंगे। परिसर में गायों के रहने-चारे की व्यवस्था की जाएगी। ऐसे इंतजाम किए जाएंगे ताकि गायें बेरोकचोक घूम-फिर सकें। आनुवंशिक सुधार के मद्देनजर इन गायों के लिए अच्छी नस्ल के सांड खरीदे जाएंगे।

केमिकल मुक्त जैविक दूध
डॉ. पाटिल ने बताया कि कॉलेज की गौशाला के माध्यम से हम केमिकल मुक्त जैविक दूध को प्रोत्साहन देंगे। गायों के लिए चारा प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाएगा। औषधीय पौधे भी उन्हें दिए जाएंगे। इससे दूध की क्वालिटी बेहतर होगी। अपने शोध नतीजों के आधार पर हम किसानों-पशु पालकों को प्रशिक्षण देंगे। हम पता लगाएंगे कि किस नस्ल की गाय एक दिन में औसतन कितना चारा खाती है।

11 नस्ल की गायें एक साथ
कॉलेज में गायों के लिए एक रिसर्च सेंटर होगा। यह 10 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला होगा। इसमें देसी गायों की 11 नस्लें रखी जाएंगी। इनमें महाराष्ट्र की खिल्लर, डांगी, लांल कंधारी, देवानी, गवलाऊ, कोंकण कपिला के साथ अन्य प्रदेशों से लाई गईं साहीवाल, गिर, राठी, थारपारकर और लाल सिंधी गायें शामिल हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर
डॉ. पाटिल ने कहा कि बायोगैस व सौर ऊर्जा से जुड़ी किफायती प्रौद्योगिकी के विकास पर हम फोकस करेंगे। गो मूत्र के चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए वैज्ञानिक तरीके से हम शोध करेंगे। पर्यटन स्थल के साथ यहां पशु पालकों, कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियनों और अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए उम्दा सुविधाएं होंगी।


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