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jain aacharya mahapragya का जीवन मानवता को समर्पित है

आचार्य महाप्रज्ञ के जन्म का 100 वां वर्ष पूरा होने के अवसर पर मुंबई के कांदिवली के तेरापंथ भवन में पत्रिका के साथ जैन धर्म के तेरापंथ महासभा के पदाधिकारियों ने विशेष चर्चा की योग और ध्यान के माध्यम से तनाव मुक्त जीवन के लिए बेहतरीन साहित्य रचा

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मुंबई

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Binod Pandey

Jun 26, 2019

patrika mumbai

jain aacharya mahapragya का जीवन मानवता को समर्पित है

अरुण लाल
मुंबई. आचार्य महाप्रज्ञ के जन्म का 100 वां वर्ष पूरा होने के अवसर पर मुंबई के कांदिवली के तेरापंथ भवन में पत्रिका के साथ जैन धर्म के तेरापंथ महासभा के पदाधिकारियों ने विशेष चर्चा की। इस दौरान आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन और दर्शन पर प्रकाश डाला गया। तेरापंथ सभा के अध्यक्ष अध्यक्ष नरेंद्र तातेड़ ने कहा कि सभी धर्मों को एक मंच पर लाने और लोगों को मानवता और अहिंसा का पाठ पढ़ाने का कार्य आचार्य ने आजीवन किया। जैन धर्म और उनके अनुयायियों का पहला कार्य है मानवता की सेवा। आचार्य महाप्रज्ञ ने अपना पूरा जीवन मानतवा के लिए कार्य किया। उन्होंने योग और ध्यान के माध्यम से तनाव मुक्त जीवन के लिए बेहतरीन साहित्य रचा। पूरा जैन समाज समूचा मानव समाज उनके विचारों से लाभान्वित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन अनुभव से मानवता को बेहतर किया। पत्रिका ने सभा के विविध पदाधिकारियों से आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन, दर्शन और विचारों को लेकर विस्तार से चर्चा की।

जैन धर्म और शिक्षा के प्रचार-प्रसार तेरापंथ संस्था लिए क्या कर रही है?
उत्तर आपके प्रश्र में दो प्रश्र है एक की जैन धर्म के प्रसार-प्रचार के लिए हम बहुत से कार्य कर रहे हैं। हम अहिंसा के महान सिद्धांत के तहत हम सभी धर्मों को एक मंच पर लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। हमारे लोग देश, विदेश में जैन मतों से मानवता को बेहतर दिशा में ले जाने के लिए लगातार प्रयास जारी है। तेरापंथ समाज में 150 स्कूल हैं्र, जहां पर केजी से लेकर डॉक्टरेट तक की शिक्षा पाई जा सकती है। उन्होंने पूरे देश का भ्रमण करके देश और दुनिया के लिए बेहतर संदेश दिए। वे सिर्फ जैन समाज के संत नहीं हैं, उन्होंने पूरी मानवता की सेवा की है। हम उनके प्रवचन, साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने को प्रयास कर रहे हैं।

नरेंद्र तातेड़, तेरापंथ सभा अध्यक्ष


आचार्य तुलसी के अणुव्रत सिद्धांत को लोगों तक पहुंचाने में महाप्रज्ञ का बड़ा योगदान है।
इस सिद्धांत ने समाज को नई दिशा दी, ऐसे में आज यह सिद्धांत लोगों के जीवन को कितना और कैसे प्रभावित कर रहा है।
अणुव्रत का अर्थ है, छोटे-छोटे नियमों के द्वारा जीवन के विकास को नई ऊंचाई पर ले जाना, मानवीय मूल्यों को स्थापित किया जाना। जब भारत आजाद हुआ तो सभी भौतिक विकास के बारे में सोच रहे थे, तब आचार्य तुलसी मानव जीवन मूल्यों को बेहतर बनाने के लिए अणुव्रत सिद्धांत के बारे में सोच रहे हैं। अणुव्रत सिद्धांत ने धर्म को मंदिर मस्जिद और गिरजाघरों से निकाल कर आम लोगों के मनों में स्थापित किया। इसकी सरलता के चलते झोपड़ी से लेकर महल तक में इसकी गूंज है। अणुव्रत का अर्थ है, भ्रष्ट्राचार मत करो, पेड़ मत काटो, दूसरे धर्म का सम्मान करो, जाति और संप्रदाय के बीच नफरत न करना। आचार्य तुलसी के इस सिद्धांत को आचार्य महाप्रज्ञ ने बहुत बड़े पैमाने पर जन-जन तक पहुंचाया।

बाबूलाल बाफना, जैन तेरापंथ सभा वरिष्ठ उपाध्यक्ष

विश्व में पर्यावरण की दशा दयनीय है। आने वाले दिनों में पानी और हवा के लिए युद्ध होने की आशंका है। जैन धर्म प्रकृति के बहुत करीब है। दुनिया को जैन धर्म प्रकृति से कैसे जुडऩे का संदेश किस प्रकार से देता है?
बढ़ता हुआ औद्योगीकरण और शहरीकरण प्रकृति को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है। हम लगातार पेड़ काट रहे हैं, जिससे प्रकृति में असंतुलन बन रहा है। जैन धर्म में अहिंसा के तहत पेड तो क्या, पत्ते तक को तोडऩे पर प्रतिबंध है। हमारे धर्म में पानी बचाना अनिवार्य रखा गया है। जैन धर्म के अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के चालीस हजार युवक वृक्ष लगाते हैं। हमारा अपने लोगों को संदेश है कि यदि एक पेड कट रहा है तो पांच पेड़ लागएं।

योगेश चौधरी, तेरापंथ सभा कोषाध्यक्ष
अध्यात्म और विज्ञान के बीच कई बार मतभेद होते हैं, समय-समय पर कई अध्ययन प्रकाशित हुए हैं। ऐसे में जैन धर्म के सिद्धांतों को विज्ञान के काफी
करीब पाया गया है। आप इससे कितना सहमत हैं?
अध्यात्म में शिखर पुरुष रहे हैं आचार्य महाप्रज्ञ, वहीं विज्ञान के शिखर पुरुष के रूप में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम आजाद को देखा जाता है, दोनों ने मिलकर एक पुस्तक लिखी "आध्यात्म और विज्ञान" इस पुस्तक में बताया गया कि अध्यात्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। जैन धर्म का कहना है कि सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए, कम भोजन करना चाहिए। विज्ञान भी यही कहता है। आचार्य तुलसी ने कहा था कि कोरा विज्ञान और कोरी आध्यात्मिकता मानव जीवन को सही दिशा नहीं दे सकती। दोनों का समन्वय ही मानवता के लिए बेहतर होगा।

मांगीलाल छाजेड़, जैन सभा उपाध्यक्ष
आचार्य महाप्रज्ञ नथमल से महाप्रज्ञ बने। ऐसा क्या था, जो एक सामान्य परिवार का बालक दुनिया को राह दिखाने वाला बन गया?
आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म एक छोटे से गांव टमकोर में हुआ, जहां स्कूल भी नहीं था। बालक नथमल जब ढाई महीने के थे तभी पिता की मृत्यु हो गई। 10 वर्ष की आयु में दिक्षा ली। आचार्य तुलसी की पाठशाला में वे शिक्षा प्राप्त की। तुलसी उनसे बहुत प्रेम करते रहे। एक बार आचार्य तुलसी ने पूछा कि क्या तुम मेरे जैसा बनना चाहोगे, महाप्रज्ञ ने कहा कि आप बनाओगे तो बन जाऊंगा। उनकी विनम्रता और कठिन परिश्रम ने उन्हें दुनिया के महानतम लोगों में शामिल कर दिया। एक बार आचार्य महाप्रज्ञ ने डॉ अब्दुल कलाम से कहा कि अब आप शांति की मिसाइल बनाओ। अपने अंतिम समय तक कलाम उन्हें याद करते हुए शांति की बात करते रहे। बंगाल के महान लेखक विमल मित्र का कहना था कि अगर आचार्य महाप्रज्ञ को पहले पढ़ा होता, तो मेरे साहित्य की दिशा ही कुछ और होती। उन्होंने अपने अनुभवों को साहित्य के रूप में रचा जिससे पूरी दुनिया को राह मिलती है।

मनोहर गोखरू, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष
आचार्य महाप्रज्ञ ने भारत की यात्रा कर नशामुक्ति और अहिंसा का संदेश दिया
आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन पर प्रकाश डालते हुए जैन तेरापंथ महासभा के मंत्री विजय पटवारी कहते हैं कि आचार्य कवि, लेखक ही नहीं भारत के लोगों को बेहद प्रेम करने वाले महान योगी हैं। उन्होंने जीवन को करीब से जाकर हमें सच्ची राह दिखाई। वहीं वरिष्ठ उपाध्यक्ष नवरत्न गन्ना कहते हैं आचार्य महाप्रज्ञ ने जीवन को जो दिया वह बहुत बड़ा है। उनकी प्रेरणा से ही गुजरात दंगा रहित हो गया है। विनोद बोहरा वरिष्ठ उपाध्यक्ष का कहना है कि आचार्य महाप्रज्ञ ने भारत की यात्रा कर नशामुक्ति और अहिंसा का संदेश दिया, जिससे भारत के लोगों में प्रेम बढ़ रहा है। इस अवसर पर विष्णू बाफना, गणपतलाल डागलिया, विनोद बोहरा, नरेंद्र जैन, बाबूलाल समदरिया, धीमराज सुराणा, ख्याली कोठारी, नितेश धाकड़, भगवती लाल धाकड़, रजनीश मेहता और भंवरलाल मौजूद थे।