
Local issues tangled with big questions
मुनीर अहमद मोमिन
ठाणे. मायानगरी के प्रवेश द्वार ठाणे में ऐसे तो कई खूबसूरत इलाके हैं, जहां बार-बार जाने को मन करेगा, लेकिन शांत-सुरम्य येऊर हिल के आसपास की जगमगाहट आंखें चौंधिया देती है। आलीशान बंगलों के बीच आदिवासियों के खूबसूरत घर हैं, जहां पहले अंधेरा था, मगर अब स्थिति बदली है। लेकिन यह हाल हर जगह नहीं है। यहां से आगे जाने पर घोड़बंदर क्षेत्र में आदिवासियों के घरों में अंधेरा है। यहां पानी और बिजली की समस्या विकास के दोहरे मापदंड की कहानी बयां करती है। वर्ली पाड़ा आदिवासी क्षेत्र है, जहां रहनेवाले अधिकांश लोग बुनियादी सुविधाओं (पानी-बिजली-सड़क) से वंचित हैं। ठाणे के लोगों को पर्याप्त पेयजल भले नहीं मिल पा रहा, मगर यहां कई खूबसूरत सरोवर हैं। इतना ही नहीं राज्य के 10 स्मार्ट शहरों में भी ठाणे का नाम शुमार है। शहर का विकास तो हुआ है, मगर विकास न होना ही सबसे बड़ा मुद्दा है। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अपने-अपने कैडर वोटर हैं। शिवसेना को जहां भाजपा और रामदास अठावले की आरपीआई पर भरोसा है, वहीं राकांपा को कांग्रेस और महाआघाड़ी में शामिल दलों के वोटरों का साथ मिलने की आस है। कड़े मुकाबले के बीच दोनों ही प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं।
समस्याओं का समाधान नहीं
वागले इस्टेट में हमारी मुलाकात किराना दुकानदार बृजेश यादव से हुई। उन्होंने बताया, क्षेत्र में कई समस्याएं ऐसी हैं, जिनका समाधान नहीं हो पाया है। इनमें पेयजल की समस्या, झोपड़पट्टी पुनर्विकास, क्लस्टर डेवलपमेंट, पार्किंग और घनकचरा व्यवस्थापन जैसी समस्याएं शामिल हैं। पर, यह मायने नहीं रखता, राजनीतिक विचारधारा के आधार पर वोटिंग होगी। ठाणे लोकसभा के अंतर्गत छह विधानसभाएं और तीन महानगर पालिकाएं हैं। ठाणे और मीरा-भायंदर क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। इसके अलावा यातायात जाम, परिवहन और अन्य मूलभूत समस्याओं से यहां के मतदाताओं को रोजाना जूझना पड़ता है। शाम के समय ठाणे शहर में भाजी की दुकान पर महिलाओं की भीड़ जमा है। महिलाएं भी राजनीतिक चर्चा में पीछे नहीं हैं। पानी का मुद्दा छेड़ते ही उबल पड़ती हैं। कल्पना वाघमारे कहती हैं कि सप्ताह में लगातार दो दिन पानी की आपूर्ति बंद रहती है। पर, वह साफ कहती हैं-इसका असर वोटिंग पर नहीं होगा। स्थानीय मुद्दों पर यह चुनाव नहीं लड़ा जा रहा है, यह लोकसभा चुनाव है, दलों के आधार पर लोगों की जीत-हार तय होगी। यानी राष्ट्रीय स्तर पर जो मजबूत दिखेगा, जिसकी ब्रांडिंग रहेगी, वही बाजी मारेगा।
स्थानीय समस्याएं भी कम नहीं
प्रीति कहती हैं ठाणे शहर को झोपड़ा मुक्त बनाने का वादा अभी अधूरा ही है। यातायात जाम से निजात नहीं मिल पा रही है। यहां पर मल्टी स्टोरी पार्किंग व्यवस्था की चर्चा तो बहुत हुई, लेकिन, अभी तक शुरुआत नहीं हो पाई है। शहर में फेरीवाले बड़ी समस्या हंै, जिस पर काफी विवाद भी हो चुका है। यहां से चल कर हम नवी मुंबई के वाशी पहुंचे, जहां की स्थिति इसके विपरीत है। बैंक कर्मी रमेश लाल बताते हैं कि यहां पुनर्विकास और पुनर्वसन सबसे बड़ी समस्या है। पुनर्विकास के कई मामले कई साल से लंबित हैं, जिस पर किसी तरह के ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। सिडको में आने वाले पुराने क्षेत्रों के पुनर्विकास का काम रुका हुआ है। नियोजित तरीके से बसाए गए सैटेलाइट शहर की इस समस्या को दूर करने की कोशिश अपर्याप्त साबित हुई है। ठाणे-मुंबई और ठाणे-मीरा भायंदर के बीच अक्सर घनकचरा व्यवस्थापन और डंपिंग ग्राउंड को लेकर तू-तू, मैं-मैं होती रहती है। इसके साथ रमेश लाल यह भी कहते हैं कि चुनाव में इन मुद्दों पर वोटिंग होगी, कहना मुश्किल होगी।
Updated on:
27 Apr 2019 09:28 pm
Published on:
27 Apr 2019 09:28 pm
