
नगर निगम चुनाव में जीत का जश्न मनाते भाजपा नेता (Photo: IANS)
महाराष्ट्र के मालेगांव में महानगरपालिका के महापौर (मेयर) और उपमहापौर चुनाव से पहले राजनीति ने एक नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है। वैचारिक रूप से एक-दूसरे के धुर विरोधी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस ने मालेगांव महानगरपालिका (MMC) में हाथ मिला लिया है। इसके तहत दोनों दलों के पार्षदों (नगरसेवक) ने मिलकर एक नया राजनीतिक मोर्चा खड़ा कर दिया है। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी है।
मिली जानकारी के अनुसार, मालेगाव महानगरपालिका (Malegaon Municipal Corporation) में कांग्रेस के तीन और भाजपा के दो पार्षदों ने मिलकर ‘भारत विकास आघाडी’ नाम से एक स्वतंत्र समूह बनाया है। इस गठबंधन ने 84 सदस्यीय मालेगांव महानगरपालिका में सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
इस नए मोर्चे का नेतृत्व कांग्रेस पार्षद एजाज बेग करेंगे। मालेगांव महानगरपालिका चुनाव के नतीजे 16 जनवरी को ही आ चुके हैं, लेकिन किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होने के कारण मेयर पद की कुर्सी अब 'भारत विकास आघाडी' के रुख पर टिकी है। कांग्रेस और भाजपा के कुल 5 पार्षदों का यह गुट 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकता है।
यह कदम उन दलों के लिए एक बड़ा झटका है जो निर्दलीयों और छोटे दलों के भरोसे मालेगांव शहर में अपनी सत्ता बनाने का सपना देख रहे थे।
इस बीच, राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर एक-दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी स्थानीय निकाय चुनावों में सत्ता के लिए एक साथ आ रहे हैं। हालांकि इस बेमेल गठबंधन के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि शहर के विकास के उद्देश्य से ऐसा किया गया है।
बता दें कि महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों में से 15 में महिला मेयर नेतृत्व करेंगी। हाल ही में महाराष्ट्र शहरी विकास मंत्रालय ने मेयर पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी का आधिकारिक ऐलान किया। इस लॉटरी के तहत मालेगांव में ओपन कैटेगरी से महिला पार्षद मेयर बनेंगी।
15 जनवरी को हुए चुनावों में राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन सत्ता तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। कई नगर निगमों में भाजपा को अपने सहयोगी दलों या स्थानीय निर्दलीय गुटों का सहारा लेना पड़ रहा है।
वहीं, सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर भी स्थानीय स्तर पर खींचतान देखने को मिल रही है। राज्य नेतृत्व ने कई जगहों पर स्थानीय इकाइयों को यह छूट दी है कि जहां आपसी सहमति न बने, वहां वे गठबंधन साझेदारों के खिलाफ भी रणनीति पर काम कर सकते हैं।
20 दिसंबर को हुए अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव के बाद भी भाजपा और कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर गठबंधन कर सबको चौंका दिया था। 60 सीटों वाली परिषद में शिंदे की शिवसेना बहुमत से मात्र 4 कम 27 सीटें जीतीं थीं, वहीं भाजपा 14 सीटें, कांग्रेस 12 सीटें, एनसीपी (अजित पवार) 4 सीटें और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटें जीतीं।
दिलचस्प बात यह है कि शिंदे सेना को सत्ता से बाहर रखने के लिए भाजपा ने धुर विरोधी कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर 'अंबरनाथ विकास आघाडी' बनाई थी, जिसे एक निर्दलीय का समर्थन मिलने पर संख्या बल 32 हो गया। जिसके बाद भाजपा की तेजश्री करंजुले पाटिल अंबरनाथ नगर परिषद की अध्यक्ष चुनी गईं। हालांकि इस गठबंधन के बाद कांग्रेस की राज्य इकाई ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपने सभी 12 नवनिर्वाचित नगरसेवकों और ब्लॉक अध्यक्ष को निलंबित कर दिया। इसके बाद सभी निलंबित पार्षदों ने भाजपा का दामन थाम लिया, जिससे अंबरनाथ की राजनीति पूरी तरह बदल गई। हालांकि, जोड़-तोड़ वाली राजनीति के लिए किरकिरी होने के बाद भाजपा ने अंबरनाथ में सत्ता स्थापित करने से पीछे हट गई।
Updated on:
02 Feb 2026 10:08 am
Published on:
02 Feb 2026 09:50 am

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