
रहमत का शामियाना और बरकत का आशियाना है रोजा
भिवंडी. रमज़ान में 29 या 30 दिन होते हैं। इनको तीन कालखंडों में बांटा गया है। पहला अशरा (कालखंड) रहमत वाला, दूसरा मगफिरत (मोक्ष) वाला और तीसरा जहन्नम की आग से मुक्ति का है। हर कालखंड को 10 दिनों में बांटा जाता है। शुरू के 10 दिन अल्लाह अपने बंदों पर रहमत फरमाता है, जो लोग अल्लाह की इस रहमत का शुक्रअदा करते हैं, उनके लिए इस रहमत में इज़ाफा होता है।
बीच के 10 दिन मोक्ष के रहते हैं। इसलिए कि रोज़ों का कुछ भाग गुजर चुका है। इन दिनों अल्लाह अपने बंदों को माफी देता है। आखिरी के 10 दिन आग से मुक्ति के हैं। रोजा रहमत का शामियाना और बरकत का आशियाना है। दरअसल शुरुआती दस रोजे यानी पहला कालखंड अल्लाह से रहमत हासिल करने का दौर है। दसवां रोजा अल्लाह की रहमत की रवानी और मेहरबानी के मील के पत्थर की तरह है। हदीस की रोशनी में देखें तो तिर्मिजी-शरीफ में मोहम्मद सल्ल. ने फर्माया, ऐ लोगों! तुम अल्लाह से फजल तलब किया करो। अल्लाह तआला सवाल करने वालों को बहुत पसंद करता है।'हजरत मोहम्मद (सल्ल.) के फरमान के मुताबिक अल्लाह ने रमज़ान के रोज़े फर्ज़ किए और तरावीह को सुन्नत किया। कई हदीसों में ये भी है कि नबी करीम ने फरमाया कि मैंने इसे सुन्नत किया। बहुत से लोगों का ख्याल होता है कि जल्दी से किसी मस्जिद में 8-10 दिन में कलाम मजीद सुन लें, फिर छुट्टी। यह ध्यान रखने की बात है कि तरावीह में दो सुन्नतें अलग-अलग हैं। एक सुन्नत कुरान शरीफ का सुनना और दूसरी तरावीह का पढऩा। अगर कोई 8-10 दिन की तरावीह पढ़कर सोचे कि पूरा सवाब मिल गया तो ऐसा नहीं।
Published on:
12 May 2019 06:11 pm
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