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यह देश मान्यता, परंपराओं और संस्कृति से चलता है, न्यायालय से नहींः संघ

भैया जी जोशी ने कहा, मैं कोर्ट का अपमान नहीं कर रहा हूं, लेकिन उचित क्या है वह भी जानना जरूरी है

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(मुम्बई): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तय किया है कि राम मंदिर निर्माण के मामले में वे न्यायालय के फैसले का इंतजार करेंगे। इसके बाद ही परिस्थितियों को देखते हुए कदम उठाया जाएगा, जिसमें आंदोलन भी शामिल है। हालांकि संघ ने उम्मीद जताई है कि न्यायालय हिन्दुओं की आस्था को ध्यान में रखते हुए निर्णय करेगा। सबरीमाला मंदिर के मामले में संघ ने दो टूक कहा कि यह देश न्यायालय से नहीं चलता, मान्यता, परंपराओं और संस्कृति से चलता है। उन्होंने कहा, मैं कोर्ट का अपमान नहीं कर रहा हूं, लेकिन उचित क्या है वह भी जानना जरूरी है।


भायंदर स्थित केशव सृष्टि में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तीन दिवसीय बैठक के अंतिम दिन सर कार्यवाह सुरेश उर्फ़ भैया जी जोशी ने पत्रकारों को यह बातें कहीं। जोशी ने कहा कि पिछले 6 वर्षों से यह मामला न्यायालय में लंबित है। दीपावली के अवसर पर हमें न्यायालय से अच्छे संदेश की अपेक्षा थी लेकिन न्यायालय ने तीसरी बार निर्णय को टाल दिया है। हाल ही में न्यायालय के दिए गए अटपटे बयान से देश के करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं।

शिवसेना हमसे अलग नहीं

उन्होंने कहा कि हमारी न्यायालय से विनती है कि इस संवेदनशील विषय पर लोगों की संवेदना को देखते हुए अपने कहे हुए बयान पर पुनः विचार करें और फैसला सुनाएं। हमने कहीं भी न्यायालय का अपमान नहीं किया है। जब तक यह मामला कोर्ट में है, तब तक हम इंतजार करेंगे लेकिन न्यायालय की भी जिम्मेदारी है की वह लोगों की भावनाओं की कद्र करे। सरकार से कानून बनाने के विषय पर भैया जी जोशी ने कहा कि सरकार का अपना अधिकार है। सरकार अपने अधिकार के लिए स्वतंत्र है। तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार ने वादा किया था कि यदि साबित हो जाएगा की यह राममंदिर की जगह है, तो सरकार इसमें हस्तक्षेप कर राममंदिर का निर्माण करेगी। राममंदिर मामले में शिवसेना के आवाज बुलंद किए जाने के विषय पर एक जवाब में उन्होंने कहा कि हिंदुत्व मुद्दे पर दोनों अलग नहीं है। हमारे साथ शिवसेना के आने से हमारी ताकत और मजबूत होगी।

सबरीमला मामले पर यह बोले

सबरीमला मामले पर उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थल पूजा क्षेत्र है। यहां महिला और पुरुष में कोई भेद नहीं होना चाहिए, लेकिन कुछ सामाजिक और पारंपरिक मान्यताएं होती हैं। उस पर भी जब तक विचार नहीं होता है, तब तक कुछ भी कहना उचित नहीं है।

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