
हर किसी को भाएगी शुभ मंगल ज्यादा सावधान
अरुण लाल
मुंबई. किसी भी कलमकार, फिल्मकार की सबसे बड़ी ताकत होती है कि वह बहुत गंभीर मसलों को सरलता से कह जाए। यह फिल्म कुछ ऐसी ही है। इस फिल्म में भी लेखक और डायरेक्टर गंभीर मसले को बहुत ही मजेदार तरीके से प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं। हर वर्ग के दर्शक को यह मजेदार कॉमेडी फिल्म लुभाएगी।
फिल्म के हर सीन में दर्शकों को हंसने के लिए ढेर सारा मसाला मिलेगा, और सोचने के लिए जमीन भी। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि गंभीर मसले पर बनाई गई यह फिल्म एक बार भी गंभीर नहीं होती। माता-पिता, चाचा, चाची भाई, बहन के हंसी मजाक करते-करते समाज को एक संदेश दे जाती है यह फिल्म।
फ़िल्म के सभी गाने बेहतर बन पड़े हैं। कहते हैं कि साहित्य समाज को आगे ले जाता है, तो यह फिल्म भी साहित्य है, जो समाज को थोड़ा ही सही पर आगे जरूर ले जाएगी।
कहानी
कहानी मध्यम वर्ग के त्रिपाठी परिवार की है। जो दो समलैंगिक युवकों अमन त्रिपाठी (जीतेन्द्र कुमार) और कार्तिक (आयुष्यमान खुराना) को लेकर आगे बढ़ती है। ये दोनों समलैंगिक रिलेशन में हैं। अमन अपनी बहन की शादी में अपने पार्टनर कार्तिक के साथ पहुंचता है।
त्रिपाठी परिवार में चाचा हैं, चाची हैं और उनकी बेटी, जिसकी शादी नहीं हो रही है। सभी एक से बढ़कर हैं। रोज के मजेदार घरेलू झगड़े कहानी की जान हैं। जहां ट्रेन में कार्तिक और अमन को किस करते हुए अमन के पिता शंकर त्रिपाठी (गजराज राव) देख लेते हैं। पिता की दुनिया ही पलट जाती है। वे इस रिश्ते की सोच-सोच कर उल्टियां करने लगते हैं। इसके बाद वे अमन को पानी के पाइप से धो कर साफ करना चाहते हैं।
वे किसी भी कीमत पर अपने बेटे के समलैंगिक संबंध को स्वीकार नहीं कर पाते। उनकी पत्नी सुनयना (नीना गुप्ता) कभी समझतीं हैं, कभी नहीं समझतीं। समझने-समझाने, अस्वीकार और स्वीकार के साथ कहानी को बहुत ही मजेदार तरीके से पेश किया गया है। आगे की कहानी के लिए फिल्म देखनी होगी
डायलाग पंच
फिल्म के संवाद ही फिल्म की जान हैं। हर फ्रेम में बेहतर और मजेदार डॉयलॉग फिल्म को बेहतर बनाते हैं। "हम गंदे लोग नहीं हैं, हम अच्छे भी नहीं हैं, हम बस लोग हैं।, "जो प्यार इनके दिमाग में फिट होता, वह दबा देते हैं" और "हमें नहीं पता हम यह समझ पाएंगे या नहीं, पर हमारी समझ के चलते आधी अधूरी जिंदगी मत जीना... जा सिमरन" हल्के फुल्के अंदाज में कहे गए गंभीर डॉयलाग मन को छू लेते हैं। फिल्म का हर संवाद बेहतर है।
डायरेक्शन
सधा हुआ डायरेक्शन फिल्म को बेहतरीन कटगरी में खड़ा करता है। फिल्म की खूबसूरती यह है कि कैमरे को सिर्फ आयुष्यमान पर फोकस नहीं किया गया। डायरेक्टर ने बहुत कम समय में फिल्म में मौजूद ज्यादातर किरदारों की कहानी कहानी कह दी है।
इस फिल्म की खूबी कहें यह डायेक्टर का कमाल इसमें मौजूद हर किरदार एक तरह का हीरो है। हर का अपना वजूद फिल्म में नजर आया है। हर फ्रेम को सलीके से बनाया गया है। बेटे को लड़के के साथ किस करते देखने के बाद उल्टी आना और पानी के पाईप से उसे धोना जैसे दृश्य फिल्म को मजबूत बनाते हैं।
एक्टिंग
कह सकते हैं कि एक्टिंग के मामले में यह फिल्म आयुष्यमान की दूसरी फिल्मों से अलग है। क्योंकि इस फिल्म में उन पर फिल्म उठाने का बोझ नहीं था। कहीं ऐसा नहीं लगता कि यह फिल्म सिर्फ आयुष्यमान खुराना की फिल्म है।
इस बार कुछ जगहों पर आयुष्मान पर पिछली फिल्म की तरह एक्टिंग करते भी नजर आए। दूसरे कलाकारों की बेहतर मौजूदगी फिल्म को बेहतर से बेहतरीन बनाती है। मोतियों की तरह पिरोई गई इस फिल्म में हर किसी ने अपने किरदार से फिल्म को पूरा किया/आगे बढ़ाया है। इसके लिए बेहतरी का श्रेय हर किरदार को जाता है।
क्यों देखें
यह बहुत मजेदार कॉमेडी फिल्म है, सो अगर हंसना है तो जाइए। यह पारिवारिक मूल्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप भी दिखाती है। इसमें संयुक्त परिवार के झगड़े, उनके प्यार, उनकी कमजोरियां, ताकत और एकता सब कुछ बहुत मजेदार तरीके से दिखाया गया है, देखना है तो जाइए।
Published on:
21 Feb 2020 04:00 pm
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