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मराठा साम्राज्य के इतिहास को समेटे व्रजेश्वरी योगनी देवी मंदिर

कई पौराणिक कथाओं और इतिहास से जुड़ा

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Mumbai news

मराठा साम्राज्य के इतिहास को समेटे व्रजेश्वरी योगनी देवी मंदिर

धर्मेन्द्र निगम की रिपोर्ट
विरार.

पालघर जिले के विरार पूर्व भिवंडी अम्बाडी रोड स्थित व्रजेश्वरी इलाके में मंदाकिनी पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा व्रजेश्वरी योगनी देवी का मंदिर कई पौराणिक कथाओं और इतिहास से जुड़ा है। गणेशपुरी पूरे क्षेत्र में गर्म पानी के कुंड को लेकर खासा प्रसिद्ध है। जानकार बताते हैं कि धरती की सतह को तोड़कर ज्वालामुखी से पिघले हुए मैग्मा बन कर निकलती है तो कभी गर्म पानी की बहने वाली धारा के रूप में बाहर आकर हमें आश्चर्यचकित कर देती है। मन्दाकिनी पर्वत के उठान के बारे में कहा जाता है कि वह पश्चात काल में हुई किसी ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बना था। तानसा नदी के किनारे बसा यह इलाका आश्चर्यचकित करने वाली विविधताओं से भरा पड़ा है। इसी तानसा नदी के एक छोर पर व्रजेश्वरी कस्बे के मुख्य चौक पर विशाल किलेनुमा "वज्रेश्वरी योगिनी देवी का मंदिर" है। इसी मंदिर के नाम पर शहर का नामकरण हुआ है। सड़क से मंदिर तक जाने के लिए 52 सीढियां चढऩी पड़ती हैं। मंदिर के मुख्य द्वार की आधी सीढियां चढऩे पर एक सुनहरे रंग का कछुए की प्रतिमा लगी है, जिसे भगवान के कूर्म-अवतार का प्रतीक माना जाता है। भिवंडी अम्बाडी रोड स्थित व्रजेश्वरी इलाके में मंदाकिनी पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा व्रजेश्वरी योगनी देवी का मंदिर कई पौराणिक कथाओं और इतिहास से जुड़ा है। सन 1739 में पोर्तुगीस शासक लोगों का वसई रियासत पर कब्जा था। । वसई रियासत के लोगों को पोर्तुगीसों के क्रूर शासन से आजादी दिलाने के लिए मराठा पेशवा बाजी राव-प्रथम के छोटे भाई चिमाजी अप्पा ने वसई किले को फ़तह करने के लिए डेरा डाला। पोर्तुगीस और मराठाओं के बीच लगभग तीन वर्षों के युद्ध चला, लेकिन वसई का किला फतह नही हो पाया। तब चिमाजी अप्पा ने देवी वज्रेश्वरी का पूजन किया। मान्यता है कि पूजन के बाद देवी ने स्वप्न में उनको वसई किले को जीतने का तरीका बताया। व्रजेश्वरी देवी के बताए तरीके से युद्ध करने से वसई किला मराठों ने जीत लिया और पोर्तुगिसों को खदेड़ दिया। जीत के बाद चिमाजी अप्पा ने वज्रेश्वरी देवी का मंदिर बनवाया। मंदिर के मुख्य दरवाज़े पर उनकी वीरता की कहानी सुनहरे अक्षरों में आज भी अंकित है।
अस्त्र के नाम पर वज्रेश्वरी देवी नाम पड़ा मुख्य मंदिर के गर्भ-गृह पत्थरों से बना हैं, मंदिर के मध्य में एक मंडप बना है। इस मंडप में पत्थरों से बने तीन नक्काशेकलात्मक दरवाज़े हैं। इसमें नारद मुनि की प्रतिमा मुख्य मानी जाती है। गर्भ-गृह के दरवाज़े के दोनों तरफ़ जय-विजय की प्रतिमा है। शास्त्रों में जय-विजय को भगवान् विष्णु का अंगरक्षक माना जाता है। मंदिर के गर्भ-गृह में वज्रेश्वरी देवी की मूर्ति है। देवी के हाथों में तलवार और गदा शुशोभित है साथ ही रेणुका देवी की भी मूर्ति है, जो भगवान् परशुराम की माता है, तीसरी प्रतिमा सप्त्श्रींगी देवी का है, जो आदिशक्ति महिषासुर-मर्दिनी थीं। वही महालक्ष्मी का भी विग्रह है। वज्रेश्वरी देवी की कहानी वज्र नामक अस्त्र से जुड़ा हुआ हैं। हमारे शास्त्रों में हजारों वर्ष पूर्व मिलता है। शास्त्रों में मिले उल्लेख के मुताबिक कल्लिका नामक एक राक्षस रहता था। कल्लिका के दुराचरण से सभी ऋ षि-मुनि परेशान थे। जिसके बाद महर्षि वशिष्ठ ने एक यज्ञ किया। ऋषि-मुनि के यज्ञ से आदिशक्ति प्रसन्न हुई । पर उस यज्ञ में देवताओं के राजा इंद्र को आहुति नहीं दी गई , जिसके कारण इंद्र क्रुद्ध हो गए और अपने "वज्र" नामक अस्त्र से ऋ षि-मुनि प्रहार कर दिया। वज्र को आते देख ऋषि-मुनि सभी भयभीत हो गए। जिसके बाद सभी ने देवी की स्तुति किया। आदिशक्ति ने सभी को अपने शरण मे लेकर रक्षा किया। एक दूसरी किदवंती भी जुड़ी है इंद्र ने अपना वज्र कल्लिका राक्षस पर चलाया था। कल्लिका ने इंद्र के वज्र को भी निष्क्रिय करने की कोशिश करने लगा तो देवी स्वयं वज्र में समाहित होकर कल्लिका राक्षस का वध किया। जिसके कारण आदिशक्ति का एक नाम व्रजेश्वरी भी पड़ा।