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…जब जलाएंगे मिट्टी के दिये, तभी रोशन हो पाएगा कुम्हारों के घर

मिट्टी के दिए बेचकर अपना घर रोशन करेंगे कुम्हार    

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मुज़फ्फरनगर. दीपो का त्योहार करीब है और दीये से दूसरे के घरों में रोशन करने वाले कुम्हार की किस्मत अंधेरे में है। दिवाली उत्सव की शान समझे जाने वाले दीपों का व्यवसाय चाइनीज आइटम के कारण संकट के दौर से गुजर रहा है। मुज़फ्फरनगर के कई गांवों में आज भी कुम्हार महंगी मिट्टी खरीदकर दीया, करवा आदि बनाकर अपना पालन पोषण करते हैं, लेकिन इन्हें आज भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार है। चाइनईज झालर की मार से कुम्हार के व्यवसाय पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। हांलाकि, फिर दीवाली को लेकर कई कुम्हारों को अच्छे व्यापार की आंस बधी हुई है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से मिट्टी के दियो से दीपावली मनाने की अपील के बाद कुम्हारों में अच्छे दिन आने की उम्मीद की किरण जागी है।

गांव ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्र की कई बस्तियों में भी कई परिवार मिट्टी के कारोबार से जुड़े हुए हैं। यहां बीते वर्षों तक कुम्हार जहां प्रति व्यक्ति एक से डेढ़ लाख तक दियों का निर्माण करते थे। वहीं, यह आंकड़ा इस वर्ष घटकर 50 हजार तक पहुंच गया है। मिट्टी के काम से जुड़े 60 वर्षीय कुम्हार हरिकिशन बताते हैं कि वक्त के साथ परंपरागत चीजें भी गायब हो रही है। पहले स्टील के बर्तनों से लेकर मिट्टी के दिये से लेकर झालर तक हमारी परंपराओं में शामिल थे। मगर अब इन परंपरागत चीजों पर आधुनिकता ने चादर डाल दिया है। दीपावली पर चाइना की झालर और लाइट जल रही है। मिट्टी के दिये बस पूजन आदि में प्रयोग किएजा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले जहां दीपावली पर मिट्टी के दियों से घर रोशन किया जाता था, आज उनकी जगह बिजली के झालर ने ले ली है। चाइना की झालरों का बाजारों में प्रयोग अधिक होने से अब हम लोग ग्राहकों के लिए तरस रहे हैं।


सस्ती के चक्कर में लेते हैं झालर
वहीं, जयभगवान कुम्हार कहते हैं कि मिट्टी के दियों की मांग लगातार कम हो रही है, जबकि मिट्टी के दाम बढ़ते जा रहे हैं। झालर सस्ती पड़ती है, जिससे मिट्टी के दिए नाम मात्र के लोग खरीदते हैं। यदि लोग दिया जलाएंगें तो गरीब कुम्हारों की जिन्दगी भी रोशन होगी। यह बात दीपावली मनाने वालों को गौर करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि कई कुम्हार अब इस पारपंरिक कार्य के अलावा जीवनयापन के लिए खेती व मजदूरी कर रहे हैं।

पहले मचती थी होड़
मिट्टी के व्यवसाय से जुड़े राजेश चक्रवती का कहना है कि अब मिट्टी के दीप का जमाना गया। कभी दीपावली पर्व से एक महीने पहले कुम्हारों के मोहल्लों में रौनक हो जाती थी और कुम्हारों में भी यह होड़ रहती थी कि कौन कितनी कमाई करेगा, लेकिन अब तो खरीददार ही नजर नहीं आते। हांलाकि कुल्हड़, सकोरा और शादी में उपयोग होने वाले मिट्टी के बर्तन आज भी प्रचलन में हैं, जिससे कुछ कुम्हारों की रोजी-रोटी चल जाती है। नत्थु व मुनिया कुम्हार ने बताया कि पहले प्लास्टिक और स्टील के बर्तनों ने उनकी आय के साधनों को आधा कर दिया। इसके बाद पीओपी ने कुम्हारों को सड़क पर लाकर पटक दिया और अब चाइना से आ रहे दीपक मूर्तियों ने उन्हें दूसरा काम करने पर मजबूर कर दिया है।