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65 फीसदी लोगों ने कहा – उनके गांव-ढाणी में नहीं पहुंचा नहर का पानी

52 फीसदी का जवाब - लाइन बिछी हुई है, लेकिन पानी नहीं आता, पत्रिका सर्वे में खुली जिले में नहरी पानी की सप्लाई के दावों की पोल

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नागौर. जिले में जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग एवं नहरी परियोजना के अधिकारी भले ही जिले के सभी 829 गांवों में नहरी पानी पहुंचाने के दावे कर रहे हैं, लेकिन उनके दावों की पोल खुद ग्रामीण खोल रहे हैं। राजस्थान पत्रिका की ओर से करवाए गए ऑनलाइन सर्वे में सामने आया है कि जिले के ज्यादातर गांव आज भी नहरी पानी से वंचित हैं। पत्रिका सर्वे में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने भाग लेकर सवालों का ऑनलाइन जवाब दिया, जिसमें 65 फीसदी लोगों का कहना है कि उनके गांव-ढाणी में अभी तक नहर का पानी पहुंचा ही नहीं। इससे पहले पत्रिका ने बुधवार को वाट्सएप पर लोगों से पेयजल सप्लाई की धरातलीय स्थिति एवं सूखे पड़े टंकी-जीएलआर के फोटो मांगे थे, जिसमें सैकड़ों लोगों ने वाट्सएप पर मैसेज करके बताया कि गांवों में विभाग ने नहरी परियोजना व जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछा दी और पानी टंकियां व जीएलआर बना दिए, लेकिन पिछले एक-दो साल से उनमें पानी नहीं आया। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सप्लाई की स्थिति दयनीय है।

52 फीसदी लोगों ने कहा - लाइन बिछी हुई है, लेकिन पानी

पत्रिका सर्वे में लोगों ने यह भी बताया कि उनके गांव में पानी की लाइन तो बिछा दी, लेकिन उसमें एक बार भी पानी सप्लाई नहीं की गई। मात्र 7.8 प्रतिशत लोगों ने बताया कि एकांतरे जलापूर्ति होती है, जबकि 18.6 ने कहा कि सप्ताह में एक बार और 21.3 प्रतिशत ने कहा कि महीने में ही एक-दो बार पानी आता है।

कनेक्शन के पैसे ले लिए, लेकिन पानी नहीं दे रहे

जिले के जनप्रतिनिधियों के साथ आमजन का यह भी कहना है कि घर-घर कनेक्शन देने के एवज में ठेकेदार ने पैसे ले लिए, लेकिन लाइन में एक बार भी पानी नहीं आया। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि गांवों में भले ही लाइन बिछा दी, लेकिन मुख्य लाइन से नहीं जोडऩे के कारण पानी नहीं मिल रहा है। सर्वे में लोगों ने यह भी बताया कि कई जगह ठेकेदार ने भुगतान उठाने के लिए मनमर्जी से लाइनें बिछा दी, जिनसे कुछ रसूखदार लोगों को लाभ मिलेगा।

टेंकरों से चला रहे काम

गर्मियों के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की किल्लत बढ़ जाती है। ऐसे में ग्रामीण नाडी, तालाब, ट्यूबवेल आदि का पानी पीने के काम लेते हैं। कुछ जगह नाडी-तालाब सूख गए हैं, ऐसे में ग्रामीणों को एक-एक हजार रुपए देकर टेंकर मंगवाने पड़ते हैं।

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