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राजस्थान का रण : जमानत नहीं बचती फिर भी हर चुनाव के प्रत्याशी
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राजस्थान का रण : जमानत नहीं बचती फिर भी हर चुनाव के प्रत्याशी

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हेमंत जोशी @ कुचामनसिटी. चुनावी माहौल बन रहा है। चुनावी चस्का भी इन दिनों हर किसी के सिर चढकर बोल रहा है। चुनावों से जुड़े कई अजीबो गरीब बातें भी निकल कर सामने आ रही है। कहीं कोई नेता दल बदल रहें हैं को कोई अपनी सीट बदल रहा है। यदि कुछ नहीं बदला है तो यह एक शख्स है, जिसे केवल चुनाव लडऩे का जुनून है। वह हर बार नावां से विधानसभा और नागौर से लोकसभा चुनाव के साथ ही कुचामन के पालिका चुनावों में अपना भाग्य आजमाता है। जीत-हार इसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मायने रखता है तो बस चुनाव लडऩा। चुनाव फार्म उठाने के लिए अलग-अलग तरह के प्रलोभन और राजनैतिक दबाव को छोड़ महज चुनाव लडऩा इनका शौक है। यह जुनून सुनने में भले ही अजीब लग रहा है, लेकिन इस जुनून ने इसका परिवार बसा दिया।

एमपी साहब के नाम से पहचान

जी हां, यह शख्स है नागौर जिले की नावां विधानसभा क्षेत्र के कुचामन शहर का कैलाशचंद वर्मा। वर्मा ने अपने जीवन का पहला चुनाव 1991 में सीधे लोकसभा का लड़ा था। इन चुनावों में वर्मा को महज 3 हजार 4 सौ 40 वोट मिले, लेकिन चुनावी चस्का लग गया। इसके बाद 1993 में विधानसभा का चुनाव लड़ा और महज 1 हजार 20 वोटों में सिमट गए। इसके बाद 1998 में फिर विधानसभा का चुनाव लड़ा जिसमें भी 7 सौ वोट मिले। 2003, 2008, 2013 में भी विधानसभाओं के चुनाव लड़ा, जिनमें इनके मतों का आंकड़ा एक हजार भी नहीं पहुंचा था। भले ही वर्मा कभी विधायक और सांसद नहीं बनें है लेकिन कुचामन में इन्हें लोग एमपी साहब के नाम से जानते-पहचानते है।

यहां मिल गई सफलता-
वर्मा ने 2000 में कुचामन नगरपालिका चुनाव में अपना भाग्य आजमाया और वार्ड संख्या 7 से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। इन चुनावों में वर्मा चुनाव जीत गए और भाजपा को समर्थन देकर पालिका उपाध्यक्ष बन गए। पालिका उपाध्यक्ष रहने के दौरान वर्मा ने भी विधानसभा चुनाव लड़ा था। 2005 में भी वर्मा ने वार्ड संख्या 17 से पार्षद पद के लिए भाग्य आजमाया लेकिन इन चुनावों में भी वर्मा हार गए।

चुनाव जीता तो हुआ ब्याह-
वर्मा ने बताया कि पहले चुनाव लड़ता था तो लोग मजाक उड़ाते थे लेकिन पार्षद चुना गया और उपाध्यक्ष बना तो परिवार के लोगों ने भी शादी करवा दी। चुनाव जीतने के बाद ही मेरा घर बस गया। इसके बाद हर चुनाव लडऩे की ठान ली। वर्मा ने बताया कि अब जब तक जीऊंगा, तब तक चुनाव लड़ूंगा।

मिले कई प्रलोभन-
वर्मा ने बताया कि पहली बार जब लोकसभा का चुनाव लड़ा तब से लेकर हर चुनावों में राजनैतिक दलों व प्रत्याशियों ने नाम वापसी के लिए प्रलोभन और लालच दिया था। कई मर्तबा वापस फार्म उठाने के लिए दबाव भी बनाया गया। लेकिन कभी फार्म वापस नहीं उठाया। वर्मा ने खींवसर विधायक बेनीवाल की भी सराहना करते हुए कहा कि वह निर्दलीय विधायक बने तो विधानसभा में खुलकर बोल सके और जनता की समस्याएं उठाई। पार्टियों के विधायक विधानसभा के खुलकर बोल भी नहीं पाते।

टिकट मांगकर मुनीम नहीं बनना-
वर्मा का कहना है कि पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे वाले नेता जनता के नहीं होकर केवल पार्टी के रह जाते है। मुझे टिकट लेकर पार्टी का मुनीम नहीं बनना है। जनता भले ही मुझे वोट दे या ना दे लेकिन मुझे पार्टियों की गुलामी नहीं करनी। मौका मिलेगा तो जनता की सेवा करुंगा और नहीं मिलेगा तब तक चुनाव लड़ूंगा। आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भी वर्मा तैयारी में जुटे हुए है।

नहीं करते प्रचार- प्रसार
विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कैलाशचंद वर्मा का चुनावी खर्च नहीं के समान रहता है। वर्मा की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, इसके बावजूद वह चुनाव लडऩा नहीं छोड़ते। अपना नामांकन भरने के लिए भी वह लोगों से सहयोग लेते है। वर्मा के ना कोई व्यापार है और ना ही कोई रोजगार है। वर्मा केवल जनसहयोग के लिए कार्य करते हैं और यहीं उनकी पहचान भी है।