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भारतीय किसानों को सस्ता यूरिया मिले, इसलिए किसान के बेटे ने ठुकरा दिया 10 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव

छोटे से गांव खारिया खंगार निवासी जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक डॉ. रमेश रलिया के आविष्कार से 2030 तक भारत सरकार के बचेंगे 40 बिलियन डॉलर

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जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक डॉ. रमेश रलिया

जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक डॉ. रमेश रलिया

नागौर. बारहवीं तक सरकारी स्कूल से पढकऱ अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी तक पहुंचे एक किसान के बेटे ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से दिए गए करोड़ों रुपए के प्रस्ताव को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया, ताकि भारतीय किसानों को सस्ता यूरिया मिल सके। यही नहीं, उनके इस त्याग से भारत सरकार के भी करीब 40 बिलियन डॉलर बचेंगे। हम बात कर रहे हैं नैनो टेक्नोलॉजी वैज्ञानिक डॉ. रमेश रलिया की, जिनके तरल यूरिया आविष्कार से न केवल भारतीय कृषि बल्कि अर्थव्यवस्था की रूपरेखा भी बदल सकती है।
कृषि वैज्ञानिकों की दुनिया में डॉ. रमेश रलिया का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे दुनिया में 'नैनो टेक्नोलॉजी' के जाने माने साइंटिस्ट्स में शुमार हैं। जोधपुर के छोटे से गांव खारिया खंगार से निकले इस युवा का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है। डॉ. रलिया को वर्ष 2023 में मारवाड़ रत्न अलंकरण दिया गया है एवं 2022 में वित्त मंत्री भारत सरकार ने चेंजमेकर - सोशल ट्रांसफॉर्मेशन अवार्ड से नवाजा। वे अब तक 60 से अधिक देशों की विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ काम कर चुके हैं। डॉ. रलिया वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक, भारत में इफको के अनुसंधान प्रमुख, आईआईटी दिल्ली तथा यूनिवर्सिटी ऑफ मिआमि में सहायक फैकल्टी रह चुके हैं एवं अमेरिका की स्मार्ट टेक्नोलॉजी संस्थापक हैं। गत दिनों नागौर दौरे पर आए डॉ. रलिया से पत्रिका ने विशेष बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश...

पत्रिका : आपने तरल रूप में नैनो यूरिया तैयार किया है, इससे क्या फायदा होगा?
डॉ. रलिया : मैंने अब तक अकार्बनिक और कार्बनिक नैनो कणों के संश्लेषण पर बीस से अधिक पेटेंट तैयार किए हैं। तरल रूप में नैनो यूरिया के आविष्कार से न केवल भारत को आयात और उर्वरक सब्सिडी में लगभग 40 बिलियन डॉलर की बचत करने में मदद मिलेगी, बल्कि कृषि उपज में भी सुधार होगा और कृषि रसायनों के अंधाधुंध उपयोग से होने वाले पारिस्थितिक नुकसान को भी रोका जा सकेगा।

पत्रिका : देश के किसानों को सस्ता यूरिया मिले, इसके लिए आपने क्या किया?
डॉ. रलिया : विश्व की कुछ शीर्ष फसल विज्ञान बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मुझे नैनो यूरिया के के पेटेंट के लिए 10 मिलियन डॉलर और 3 लाख डॉलर के वार्षिक वेतन का प्रस्ताव दिया था, लेकिन मैंने अपने आविष्कार को बिना किसी टेक्नोलॉजी फीस के भारत सरकार के मार्फत इफको को लाइसेंस देने का फैसला किया, जो देश की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी समिति है। भारतीय किसानों की कम लागत पर पोषक तत्वों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मेरी सरकार के समक्ष एक ही शर्त थी कि नैनो फर्टिलाइजर - नैनो यूरिया किसानों को लागत मूल्य पर या सबसे कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

पत्रिका : आजकल ज्यादातर युवा पैसे कमाने के लिए कुछ भी करते हैं, आपने इतना बड़ा प्रस्ताव क्यों ठुकराया?
डॉ. रलिया : मैं भी चाहता तो तरल नैनो यूरिया के पेटेंट को व्यावसायिक रूप से बेचकर बड़ा पैसा कमा सकता था, लेकिन मैंने अपना शोध मुफ्त में देने का विकल्प चुना। इसकी प्रमुख वजह, एक किसान परिवार से होने के कारण मैंने खेती की कठिनाइयों को प्रत्यक्ष रूप से देखा है। मुझे इस विश्वास के साथ बड़ा किया गया है कि आप अपने देश और समुदाय के लिए जो करते हैं, वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक मायने रखता है। इसके अलावा, एक वैज्ञानिक के रूप में, मैं कुछ भी नहीं दे रहा हूं तो यह मेरे पर्यावरण, किसानों और देश में मेरा निवेश है।

पत्रिका : सुना है आपने आईआईटी दिल्ली में भी नि:शुल्क सेवा दी?
डॉ. रलिया : हां, यह सही है। मुझे एक साल के लिए आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड टेक्नोलॉजी में सहायक संकाय नियुक्त किया गया, तो मैंने कोई भी वेतन लेने से इनकार कर दिया। मैंने संस्थान को लिखा, ‘हमारे देश के लिए योगदान देना मेरे लिए सम्मान की बात है, इसलिए मैं शून्य शुल्क पर योगदान दूंगा।’

पत्रिका : नैनो यूरिया के तरल रूप से फसलों को क्या फायदा होगा?
डॉ. रलिया : पारंपरिक यूरिया को मिट्टी में दानेदार रूप में डालने के बजाय मेरे पेटेंटेड नैनो यूरिया को तरल रूप में फसल के दो प्रमुख विकास चरणों के दौरान सीधे पत्तियों पर छिडक़ा जा सकता है। अति-छोटे कण मिट्टी की तुलना में सीधे पत्ती से बेहतर अवशोषित होते हैं। मिट्टी में डाले जाने वाले पारंपरिक यूरिया का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पौधों की ओर से अवशोषित नहीं हो पाता और बर्बाद हो जाता है। यह मिट्टी को अम्लीय बनाता है और पानी का बहाव जल निकायों को प्रदूषित करता है।


प त्रिका : तरल नैनो यूरिया का छिडक़ाव ड्रोन न खरीद सकने वाले किसानों के लिए समस्या बना हुआ है, बिना ट्रेनिंग क्या किसान इसका छिडक़ाव कर सकते हैं?
डॉ. रलिया : हां, किसान तरल यूरिया का छिडक़ाव कीटनाशक छिडकऩे वाले स्प्रेयर पम्प या मशीन से कर सकते हैं, जो आजकल हर गांव में काफी संख्या में मिल जाते हैं।

पत्रिका : कई किसानों ने इससे लागत बढऩे की बात कही है?
डॉ. रलिया : हां, यह सही है कि तरल नैनो यूरिया के छिडक़ाव से लागत बढ़ती है, लेकिन लागत के साथ उत्पादन भी बढ़ रहा है, जो लागत की तुलना में ज्यादा है।

पत्रिका : यह यूरिया बाजार में अभी व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसके लिए क्या किया जा रहा है?
डॉ. रलिया : तरल नैनो यूरिया का आविष्कार किए दो साल ही हुए हैं। इसलिए शुरुआती चरण है। इसकी उपलब्धता बढ़ाने के लिए अब निजी कम्पनियां भी प्लांट लगा रही हैं। इफको भी 8 प्लांट तैयार कर रहा है। जल्द ही उपलब्धता सुगम हो जाएगी।

पत्रिका : 5 ऐसे लाभ जो इसके प्रयोग से हो सकते हैं?
डॉ. रलिया : फसल के दो प्रमुख विकास चरणों के दौरान सीधे पत्तियों पर छिडकऩे से अति-छोटे कण मिट्टी की तुलना में सीधे पत्ती से बेहतर अवशोषित होते हैं।
- मिट्टी में डाले जाने वाले पारंपरिक यूरिया का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पौधों की ओर से अवशोषित नहीं हो पाता और बर्बाद हो जाता है।
- तरल नैनो यूरिया लगभग 14 मिलियन टन सब्सिडी वाले यूरिया की जगह ले सकता है, जिससे 2030 तक देश को लगभग 40 बिलियन डॉलर के आयात की बचत होगी।
- इसके भंडारण लागत में काफी कमी आएगी।
- तरल नैनो यूरिया अनाज में फसल उत्पादकता को 24 प्रतिशत और फलों और सब्जियों में 8 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।
- भारत सरकार उर्वरक सब्सिडी पर प्रति वर्ष औसतन लगभग एक लाख करोड़ से अधिक खर्च करती है। रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी का बांझपन, पारिस्थितिक क्षति और विषाक्त खाद्य शृंखला पैदा होती है, जो तरल यूरिया से नहीं होगी।


पत्रिका : क्या इस तकनीक के कोई नुक़सान हैं?
डॉ. रलिया : भारत सरकार की ओर से मेरे पेटेंट के आधार पर फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर में तय किए गए नैनो टेक्नोलॉजी के मानकों एव कम्पोजीशन के आधार पर बनाकर इसका उपयोग किया जाए तो इसका कोई नुकसान नहीं है। हमारे पेटेंट आधारित उत्पाद को जीवन विज्ञान के परीक्षण, पर्यावरण एवं जीव - जंतुओं पर भी परीक्षण किया, जिससे कोई नुकसान नहीं है।

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