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पद्मश्री भाम्भू ने ‘7जे’ से सांसदों को समझाया पर्यावरण संरक्षण का महत्व

पद्मश्री हिम्मताराम भांभू ने 45 मिनट के प्रेजेंटेशन में पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण एवं वन्यजीव संरक्षण पर रखी अपनी बात

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Padmashri Bhambu explained to MPs importance of environmental protection

Padmashri Bhambu explained to MPs importance of environmental protection

नागौर. संसद की पार्लियामेंट्री रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसीज (प्राइड) द्वारा ऑनलाइन आयोजित कार्यक्रम के तहत नागौर के पद्मश्री हिम्मताराम भाम्भू ने गुरुवार को ‘7जे’ (जल, जंगल, जीव, जमीन, जलवायु, जैविक व जनसंख्या) के माध्यम से सांसदों को पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाया। भाम्भू द्वारा कलक्ट्रेट स्थित एनआईसी के माध्यम से करीब 45 मिनट पीपीटी द्वारा अपना प्रेजेंटेशन देकर हर बिन्दू पर विस्तार से जानकारी दी। भाम्भू के प्रेजेंटेशन को प्राइड की डायरेक्टर डॉ. सीमा कौल सिंह सहित अन्य अधिकारियों ने काफी सराहा।
पर्यावरण प्रेमी पद्मश्री भाम्भू ने एनआईसी के माध्यम से लोकसभा सचिवालय में पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण एवं वन्यजीव संरक्षण एवं सात ‘ज’ पर पर विस्तार से सांसदों को मानव जाति के लाभ के लिए सुझाव दिए व पीपीटी दिखाकर एनआईसी अपने द्वारा किए गए कार्यों को भी बताया।

बताया राज्य वृक्ष खेजड़ी का महत्व
भाम्भू ने बताया कि राज्य वृक्ष खेजड़ी की लूंग, फलियों (सांगरी) को भेड़-बकरी, गाय आदि पशुओं को खिलाया जाता है। उन्होंने बतया कि खेजड़ी का पेड़ अकाल से लडऩे में किसान का बहुत अधिक सहायक होता है। 1956 के अकाल में राजस्थान के किसानों ने धान का घोर अभाव होने के कारण खेजड़ी की छाल व पत्तों से रोटियां बनाकर खाई और अकाल का समय व्यतित किया। उस समय एक कवि ने कहा था - ‘खेजडिय़ा खो खालिया, थारो एक-एक पान अमोल। मानव भूखा पेट भरे, छौडा थारा छोल।’ भाम्भू ने बताया कि खेजड़ी की सांगरी सब्जी के रूप में बहुत ही पोष्ठिक होती है। सांगरियां किसानों को शारीरिक एवं आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है।

वन विभाग की भूमि में मानवीय दखल कम हो
भाम्भू ने भारत में वन विभाग की जितनी भी जमीन है, उसका केन्द्र द्वारा सर्वे करवाकर उनमें मानवीय दखल को कम किया जाए तथा उस क्षेत्र को केवल पेड़-पौधों व वन्यजीवों के लिए संरक्षित किया जाए। खेत का पानी खेत में रहने के लिए लिए प्रत्येक किसान के खेत में एक टांका (हौद) बनाया जाना चाहिए, जिसके लिए सरकार अनुदान दे तथा अनुदान की शर्तें स्वरूप उनके खेत में 50 पौधे लगवाने चाहिए। उन्होंने कहा कि टांका बनवाने से पानी का संचय होगा, जो जरूरत के समय काम आएगा तथा भूमि का जल स्तर भी बढ़ेगा, जिससे पर्यावरणीय संतुलन में सहयोग मिलेगा। इस योजना को महात्मा गांधी नरेगा योजना से जोड़ा जाए।

विकास और विनाश का हो आकलन
पद्मश्री ने कहा कि सन 1953 से लेकर आज तक सम्पूर्ण भारत में कितना विकास हुआ तथा पर्यावरण, वन व वन्यजीवों का कितना विनाश हुआ, इसका एक उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा आकलन एवं विश्लेषण किया जाना चाहिए, ताकि इससे पता चले की वर्तमान में प्रकृति प्रदत्त प्रकोप इतने अधिक क्यों है? इस प्रयास से भारत के भविष्य की राह भी प्रशस्त होगी।

मनरेगा में हो गोपालन
भाम्भू ने कहा कि मनरेगा योजना से गाय को भी जोडऩा अति आवश्यक है। इसमें यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि जिस परिवार के व्यक्ति मनरेगा में कार्य कर रहे हैं, यदि वो एक गाय की देखरेख व पालन पोषण करेंगे तो सरकार अतिरिक्त भुगतान करेंगी। जिससे उस परिवार को दूध, दही, घी, जैविक खाद तथा गो-मूत्र मिलेगा। इसके साथ पौधरोपण के अन्तर्गत यदि एक किसान अपने खेत में 10 पौधे लगाकर 5 वर्ष में पेड़ बनाता है तो उसे अनुदान दिया जाए। मनरेगा में इस कार्यक्रम को सम्मिलित किया जाता है तो देश के 40 करोड़ किसानों के खेत में 400 करोड़ पेड़ होंगे। भाम्भू ने नशा मुक्ति आंदोलन चलाने, पॉलीथिन मुक्त भारत बनाने, वन्य जीव संरक्षण कानून को कठोर बनाने तथा गांवों को सशक्त व आत्मनिर्भर बनाने की बात कही।