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नागौर…फायर सेफ्टी के नाम पर बड़ा खेल, नोटिस बांटकर सो गई नगरपरिषद, दो दिन की दिखावटी कार्रवाई, फिर ठंडे बस्ते में पूरा अभियान

नागौर। लखनऊ के कोचिंग संस्थान में आग की घटना के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर नगरपरिषद ने 135 संस्थानों को नोटिस जारी किए और एक शोरूम व एक डिजिटल लाइब्रेरी को सील किया। इसके बाद कार्रवाई ठंडी पड़ गई। जिन संस्थानों में सुरक्षा मानकों की कमियां मिली थीं, वहां सात दिन बाद दोबारा जांच तक नहीं हुई। समय बीतने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं हो सका कि कमियां दूर हुईं या नहीं। ऐसे में अभियान की प्रभावशीलता और जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। अब लोगों को कार्रवाई के अगले चरण का इंतजार है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित।
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Nagaur. Municipal Council

नागौर. फायर आदि की सुरक्षा को लेकर नगरपरिषद की बेपरवाही से संकट में शहर

135 संस्थानों को नोटिस दिया था, समय सीमा खत्म, दोबारा जांच नहीं, फाइलों में दबी रिपोर्ट

  • राजमार्ग के होटल और विवाह स्थल जांच से बाहर कैसे, अब तक जिम्मेदारों ने नहीं कराई जांच-लखनऊ हादसे के बाद शुरू हुआ अभियान एक शोरूम और डिजिटल लाइब्रेरी सील करने के बाद थमानागौर. लखनऊ के कोचिंग संस्थान में आग से हुई जनहानि के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर नगरपरिषद ने शहर में जांच अभियान चलाया, 135 संस्थानों को नोटिस जारी किए और गांधी चौक के पास किले की ढाल स्थित एक प्रतिष्ठित कपड़ा शोरूम तथा एक डिजिटल लाइब्रेरी को सील भी किया। लेकिन इसके बाद कार्रवाई अचानक थम गई। जिन संस्थानों में सुरक्षा मानकों की खामियां मिली थीं, वहां व्यवस्थाएं सुधरीं या नहीं, इसकी दोबारा पड़ताल तक नहीं हुई। विभागीय जानकारों की माने तो रसूखदारों की हनक के आगे समक्ष नतमस्तक हुआ फायर सुरक्षा अभियान केवल सरकारी निर्देशों की औपचारिक पालना बनकर रह गया।समय बीता, फिर भी नहीं की जांचशहर की हर दूसरी इमारत में न एंट्री है न एग्जिट। सीढिय़ों पर ताले, बेसमेंट में कोचिंग, ऊपर शोरूम, एक ही गेट से हजारों की भीड़। ये दुकानें नहीं, गैस चैंबर हैं। यह परिषद को सब पता है। सालों से यह मौत के गोदाम बिना सुरक्षा व्यवस्था के के कैसे चल रहे हैं, जबकि बिना मिलीभगत के एक ईंट भी नहीं लगती, यहां तो पूरी-पूरी बिल्डिंगें बिना फायर सिस्टम के खड़ी हैं। अपुष्ट सूत्रों की माने तो कथित रूप से मिलीभगत के खेल में सुरक्षा व्यवस्था केवल एक खिलौना बनकर रह गई है। हालांकि नगरपरिषद के अधिकारी कहते हैं कि 135 को नोटिस दिया है, जबकि नोटिस जारी होने के बाद निर्धारित 7 दिन की अवधि में व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए। लेकिन समय सीमा पूरी होने के बाद इन संस्थानों का दोबारा निरीक्षण किया गया या नहीं, कमियां दूर नहीं हुईं तो नियमानुसार आगे क्या कार्रवाई की गई, इसका भी कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया। इस संबंध में नगरपरिषद के अधिकारियों से यह सवाल पूछे गए कि किस अफसर ने दोबारा जांच की, किस संस्थान ने फायर सिलेंडर लगाया, लेकिन इनमें से एक भी सवाल का जवाब अधिकारियों के पास नहीं मिल रहा है। सूत्रों की मानें तो मियाद खत्म होने के बाद भी जिम्मेदारों ने एक भी संस्थान में दोबारा झांकने की जहमत नहीं उठाई गई।

दो सीलिंग करके हीरो बनने चले थे: सीलिंग की नौटंकी
गांधी चौक में एक शोरूम और एक डिजिटल लाइब्रेरी को सील करके परिषद ने ऐसा दिखाया जैसे अभियान में किसी को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन हकीकत ये है कि इसके बाद एक इंच भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। अंदर की खबर ये है कि जैसे ही लिस्ट में रसूखदारों नेताओं के करीबियों के नाम आए तो फिर पूरे अभियान की हवा ही निकल गई। अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। बस, इसके बाद केवल नोटिस देकर बड़े रसूखदार को साइलेंट क्लीन चिट दे दी गई। यही वजह है कि 135 नोटिस के बाद भी शहर की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई। इससे अब जिम्मेदारों की भूमिका भी संदेहों के घेरे में आ गई है। शहरवासियों का मानना है कि अब मामला लखनऊ का नहीं, नागौर का है, अगला हादसा किस गली में होगा, और उसकी जिम्मेदार कौन होगा आदि के जवाब मिलने चाहिए। अगर जवाब नहीं है तो मान लिया जाए कि यह अभियान सिर्फ कागजी था या फिर अगली अनहोनी का इंतजार किया जा रहा है…!
हाईवे किनारे होटल-ढाबे भी दायरे से बाहर
फायर सुरक्षा अभियान के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे संचालित होटल-ढाबों और अन्य बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी व्यापक कार्रवाई का कोई असर नजर नहीं आया। नगरपरिषद की ओर से इनकी जांच हुई तो कब हुई, और नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई सरीखे सवालों के जवाब भी नहीं मिल रहे हैं। जबकि इन स्थानों पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोगों का आवागमन रहता है, लेकिन फायर सुरक्षा, आपात निकास, पार्किंग और अन्य सुरक्षा मानकों की प्रभावी जांच का दायरा यहां तक क्यों नहीं पहुंच सका, लोगों की समझ से परे रहा।

एक्सपर्ट व्यू: अगर अब भी नहीं चेते तो शहर और ज्यादा असुरक्षित होगा
नगरपरिषद के पूर्व सहायक नगर नियोजक मामराज का कहना है कि फायर सुरक्षा अभियान केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिन भवनों में कमियां मिली हैं, वहां निर्धारित समय के बाद दोबारा निरीक्षण कर अनुपालन सुनिश्चित करना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होता तो बिना आपात निकास, संकरी सीढिय़ों और फायर सुरक्षा उपकरणों के संचालित भवन पहले की तरह लोगों की जान के लिए खतरा बने रहेंगे। इससे भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में जनहानि का जोखिम बढ़ सकता है और लोगों का प्रशासनिक कार्रवाई पर भरोसा भी कमजोर होगा।

क्या कहते हैं जिम्मेदार: वही रटा-रटाया जवाब
नगरपरिषद आयुक्त का कार्यभार संभाल रहे उपखंड अधिकारी गोविंद सिंह भींचर ने कहा कि जिन संस्थानों को नोटिस जारी किए गए हैं, वहां सुरक्षा मानकों की पालना सुनिश्चित कराई जाएगी। जहां निर्धारित नियमों का पालन नहीं मिलेगा, वहां नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। जन सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती जाएगी।