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बड़ीखाटू के पत्थर से बनी कलात्मक चक्की की बाहरी राज्यों में डिमांड

शिल्पकारों हाथों से बनाते हैं आटा पीसने की चक्की , ओखली, सिल्लोढी वर्तमान में 100 मजदूर जुड़े है इस काम से पंजाब व हरियाणा जाता है माल

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 बड़ीखाटू के पत्थर से बनी कलात्मक चक्की की बाहरी राज्यों में डिमांड

बड़ीखाटू . बनाई गई कलात्मक आटा चक्की।

नागौर जिले के बड़ीखाटू कस्बे की खानों से निकलने वाला सेंड् स्टोन विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन इस पत्थर से कितने प्रकार की कलात्मक वस्तुएं बनाई जाती है इसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता। बड़ीखाटू के पत्थर से वर्षों पहले बनाए गए कलात्मक झरोखे आज भी देखने योग्य हैं। इन झरोखों को देख हर कोई चकित हो जाता है कि प्राचीन समय में बिना मशीन के पत्थर में कलाकारी कर शिल्पकारों ने कैसे कलात्मक झरोखे बनाकर हवेलियों के चार चांद लगाए थे। वर्तमान में ये झरोखे मशीनों से बनने लगे हैं। इतना ही नहीं कारीगर आटा पीसने की चक्की, धान कूटने को ओखली व कुंडी का भी निर्माण कर रहे हैं जिनकी हरियाणा व पंजाब सहित अन्य राज्यों में आज भी काफी मांग है।

देशी मशीनों में न बिजली की जरूरत न दूसरा खर्च
एक समय था जब घरों में आटा पीसने के लिए पत्थर की बनी चक्की काम ली जाती थी। इसमें महिलाएं आटा, दलिया पीसती थी। मिर्ची पीसने के लिए पत्थर के सिल्लोढी काम ली जाती थी। दलिया ,बाजरा कूटने के लिए ओखली काम आती थी। जिन्हें बड़ीखाटू के कारीगर आज भी काफी कलात्मक रूप में बनाते हैं। घरों में पानी भरने के लिए पत्थर की कुण्डी रखी जाती थी। इनको कारीगर पत्थर की घडाई करके तैयारी करते थे। समय साथ संसाधन बढ़ने और मशीनीकरण के कारण काम तोड़ा कम हो गया है। वहीं शिल्पकारों की संख्या भी घटी है। पत्थर की घट्टी, ओखली , सिल्लोडी व कुंडी एक बार खरीदने पर वर्षो तक बिना खर्च के काम आती है। इन देशी मशीनों में न तो बिजली की जरूरत होती है और न किसी खर्चे की।

हरियाणा पंजाब में अत्यधिक मांग

खाटू के पत्थर से बनी चक्की, सिल्लोढी व कुंडी की हरियाणा और पंजाब में ज्यादा रहती है। शिल्पकारों ने बताया कि कस्बे से प्रतिमाह दो- तीन ट्रक भरकर माला हरियाणा , पंजाब जाता है। वहां पर किसान लोग इन्हें काफी खरीदते हैं। किसान स्वयं के लिए देशी तरीके से खाना बनाने और पशुओं के चारे पानी को स्वादिष्ट बनाने के लिए इनका उपयोग करते हैं।