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VIDEO…गजकेसरी, हर्ष एवं सौभाग्य के शुभ योग में मनाई जाएगी दीपावली

विभिन्न प्रकार के शुभ योगों से बने राजयोग में लक्ष्मी पूजन रहेगा फलदायी

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Nagaur news

Diwali will be celebrated in the auspicious time of Gajakesari, joy and good fortune

-शनि स्वंय की राशि में विराजमान होकर शश महापुरुष राजयोग का करेंगे निर्माण
नागौर. इस वर्ष दीपावली 12 नवंबर को गजकेसरी, हर्ष एवं सौभाग्य आदि शुभ योगों के साथ मनाई जाएगी। दीपावली पर राजयोग बन रहा है। इसमें गजकेसरी, हर्ष, उभयचरी, काहल और दुर्धरा नाम के होंगे। इन राजयोगों का निर्माण शुक्र, बुध, चंद्रमा और गुरु ग्रह के योग तथा आपस में दृष्टि योग स्थितियों के कारण बनेंगे। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गजकेसरी योग को बहुत ही शुभ माना जाता है। यह योग मान-सम्मान और लाभ देने वाला साबित होता है। हर्ष योग धन में वृद्धि और यश दिलाता है। जबकि काहल ,उभयचरी और दुर्धरा योग शुभता और शांति दिलाता है। बताते हैं कि बताते हैं कि सालों के बाद ऐसा दुर्लभ संयोग हुआ है जब शनि अपनी स्वयं की राशि कुंभ में विराजमान होकर शश महापुरुष राजयोग का निर्माण करेंगे। पंडित सुनील दाधीच ने बताया कि इस बार दीपावली पर्व पर सूर्य चंद्रमा तथा मंगल तीनों ही तुला राशि में विद्यमान रहेंगे। इससे त्रिग्रही योग का निर्माण होगा। यह बेहद ही शुभ माना जाता है। इसके साथ ही दीपावली पर सुबह सूर्योदय से लेकर दोपहर 4 बजकर 22 तक आयुष्मान योग रहेगा। इसके बाद सौभाग्य नामक शुभ योग प्रारंभ होगा। यह पूरी रात्रि रहेगा। दीपावली के साथ ही इस बार नरकचतुर्दशी, रूप चतुर्दशी और अरुणोदय स्नान भी रविवार 12 नवंबर को किया जाएगा। 12 नवंबर रविवार को दोपहर 2 बजकर 45 मिनट से अमावस्या तिथि प्रारंभ हो जाएगी। दूसरेे दिन यानि की सोमवार 13 नवंबर को 2 बजकर 57 मिनट तक ही रहेगी। निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार दीपावली का पर्व प्रदोष काल के समय अमावस्या की उपस्थिति वाले दिन मनाना आवश्यक होता है। इसलिए इस नियम अनुसार दीपावली का पर्व उदयात चतुर्दशी तिथि में ही मनाना शास्त्र अनुसार उचित रहेगा।
दीपावली पर पूजन के दौरान यह चौघडिय़ा व लग्न रहेगा
लक्ष्मी पूजन के लिए स्थिर लग्न का विशेष महत्व बताया गया है। चौघडिय़ा वेला अनुसार पूजा के लिए नागौर के सूर्योदय समय अनुसार पूरे दिन में चौघडिय़ा इस प्रकार रहेंगे। इसमें सुबह 8 बचकर 15 मिनट से 9 बजकर 36 मिनट तक चंचल वेला सामगतिक मान्य प्राप्त है। 9 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 18 मिनट तक लाभ अमृतवेला तथा दोपहर 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 41 तक अभिजीत मेला रहेगी। इसी क्रम में 1 बजकर 43 मिनट से 3 बजकर 4 मिनट तक शुभ वेला रहेगी। शाम को 5 बजकर 42 मिनट से रात्रि 10 बजकर 40 मिनट तक शुभ अमृत तथा चंचल वेल सामगतिक मान्य रहेगा। इसके बाद रात्रि 2 बजकर 01 मिनट से 3 बजकर 35 मिनट तक लाभ वेला मुहूर्त रहेगा। स्थिर लग्न अनुसार पूजा करने का श्रेष्ठ समय वृश्चिक लग्न सुबह 7 बजकर 20 मिनट से 09 बजकर 33 मिनट तक ,कुंभ लग्न दोपहर 1 बजकर 21 मिनट से 2 बजकर 55 मिनट तक ,तथा वृषभ लग्न संध्या काल 6 बजे से 6 बजकर 57 मिनट तक तथा सिंह लग्न रात्रि 12 बजकर 27 से 2 बजकर 43 तक रहेगा प्रदोष वेला का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 45 से रात्रि 9 बजकर 03 तक रहेगा। द्विस्वभाव लग्न धनु लग्न सुबह 9 बजकर 37 मिनट से 11 बजकर 40 तक मीन लग्न 2 बजकर 55 मिनट से 4 बजकर 22 मिनट तक तथा मिथुन लग्न रात्रि 7 बजकर 57 मिनट से 10 बजकर 10 मिनट तक तथा देर रात्रि कन्या लग्न 2 बजकर 40 मिनट से 4 बजकर 58 तक सुविधानुसार अलग-अलग पूजा के लिए अपनी सुविधा अनुसार समय का चयन किया जा सकता है। गोवर्धन पूजा 14 नवंबर को एवं भैयादूज 15 नवंबर को मनाई जाएगी।
प्रदोष काल में स्थिर लग्न में पूजन करना सर्वोत्तम
देवी लक्ष्मी का पूजन प्रदोष काल में किया जाना चाहिए। प्रदोष काल के दौरान स्थिर लग्न में पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है। इस दौरान जब वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि लग्न में उदित हों तब माता लक्ष्मी का पूजन किया जाना चाहिए। क्योंकि ये चारों राशि स्थिर स्वभाव की होती हैं। मान्यता है कि अगर स्थिर लग्न के समय पूजा की जाये तो माता लक्ष्मी अंश रूप में घर में ठहर जाती है। महानिशीथ काल के दौरान भी पूजन का महत्व है।इस काल में मां काली की पूजा का विधान भी है। इस दिन अपनी सुविधा अनुसार सुबह दोपहर, संध्या और रात्रि के समय शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा और आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक पर आती हैं और हर घर में विचरण करती हैं। इस दौरान जो घर हर प्रकार से स्वच्छ और प्रकाशवान हो, वहां वे अंश रूप में ठहर जाती हैं इसलिए दिवाली पर साफ-सफाई करके विधि विधान से पूजन करने से माता महालक्ष्मी की विशेष कृपा होती है। लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर पूजा भी की जाती है। पूजन के दौरान इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
दिवाली की पूजा सामग्री
धूप, दीप, रोली, कुमकुम, अक्षत, हल्दी, सिंदूर, केसर, कपूर, कवाला, दुर्वा, फल, फूल, गन्ना जनेऊ, पान का पत्ता, गुलाब और चंदन का इत्र, कमल गट्टे की माला, शंख, चांदी का सिक्का, गंगाजल, आसन, चौकी, काजल, हवन सामग्री, फूलों की माला, नारियल, लौंग, इलायची, वस्त्र, रुई,शहद, दही, गुड़, धनिया के बीज, पंचामृत, खील बताशे, पंच मेवा, मिठाई, सरसों का तेल या घी, मिट्टी का दिया और केले का पत्ता समेत सभी पूजा सामग्री एकत्रित कर लेनी चाहिए।
दीवाली की पूजाविधि
घर के ईशान कोण या उत्तर दिशा में एक छोटी पर लाल कपड़ा बिछाकर उसमें गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर सबसे पहले गणेश-लक्ष्मी का आचमन करना चाहिए। इसके बाद गंगाजल में पानी मिलाकर गणेश जी को स्नान कराएं और इसके बाद लक्ष्मी जी को स्नान कराकर अब मां लक्ष्मी जी को गुलाब या कमल का फूल चढ़ाएं, उन्हें गुलाब का इत्र और वस्त्र अर्पित करना चाहिए। इसके साथ ही गणेश जी को वस्त्र, फूल, और चंदन का इत्र चढ़ाना चाहिए। फिर लक्ष्मी माता और गणेश जी के सामने पूजा की सभी सामग्री अर्पित कर सभी देवी-देवताओं को अपनी अनामिका उंगली से चंदन और अक्षत लगाएं। इसके बाद देवी लक्ष्मी और गणेश जी की विधि-विधान से पूरा करें। पूजा के दौरान कमल गट्टे की माला से मंत्रों का जाप करें और उनकी आरती उतारें। मां लक्ष्मी और गणेश जी के समक्ष दक्षिणा चढ़ाकर पूजा के बाद मंदिर में दान करना चाहिए। पूजा समाप्ति के बाद एक बार फिर से उनकी आरती उतारें और पूजा में हुए गलती की क्षमा मांग लें।