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फीफा वर्ल्ड कप का जोश हाई, नागौर में नहीं सुविधा, गांव के हर घर में फुटबॉलर

एक तरफ पूरी दुनिया में फीफा वर्ल्ड कप से फुटबॉल प्रेमियों का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा है। ऐसा उत्साह नागौर जिले में भी है। परन्तु यहां फुटबॉल का न कोच है और न ही संसाधन। इस बीच जिले के फरड़ोद के ​खिलाड़ी अलग की लकीर खींच रहे है। यहां हर घर से फुटबॉलर है। अपने स्तर पर ग्राउंड और सामान की व्यवस्था कर यहां के फुटबॉलर देश में प्रतिभा का डंका बजा रहे है।

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नागौर. फीफा वल्र्ड की दस्तक होते ही फरड़ोद गांव में बने स्टेडियम का जोश बढऩे लगा, स्टेडियम में फुटबाल खेलते हुए स्थानीय खिलाड़ी

नागौर. फीफा वल्र्ड की दस्तक होते ही फरड़ोद गांव में बने स्टेडियम का जोश बढऩे लगा, स्टेडियम में फुटबाल खेलते हुए स्थानीय खिलाड़ी

नागौर. दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल आयोजन फीफा वर्ल्ड कप को लेकर फुटबॉल प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह और जोश है। परन्तु उन्हें मलाल है स्थानीय स्तर पर फुटबॉल खेलने लायक सुविधाओं के नहीं होने का। नागौर जिले में फुटबॉल के लिए कोच और स्तरीय ग्राउंड दोनों ही नहीं है। जबकि जिले का फरड़ोद गांव आज भी फुटबॉल की पहचान को कायम रखे हुए है। गांव के हर घर में खिलाड़ी मिल जाएगा। विडंबना है कि खेल प्रतिभाओं के होने के बावजूद फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रयास नहीं हो रहे है।

फरडोद की कहानी: पांच दशक का स्वर्णिम सफर

फरड़ोद में फुटबॉल की नींव वर्ष 1975 में वरिष्ठ अध्यापक मोहम्मद अली (अनवरजी) ने रखी थी। उन्होंने बंजर भूमि को समतल कर खेल मैदान तैयार कराया और बच्चों को फुटबॉल से जोड़ा। साल 1980 में उनकी मेहनत का परिणाम सामने आना शुरू हुआ। इसके साथ ही गांव का स्वर्णिम दौर शुरू हुआ। 1981-82 में फरड़ोद ने पहली बार जिला स्तरीय प्रतियोगिता जीती। इसके बाद 1983, 1984 तथा 1985 में लगातार तीन साल तक राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में विजेता बनकर प्रदेशभर में पहचान बनाई।

88 राज्य और 13 राष्ट्रीय खिलाड़ी दिए

फरड़ोद की फुटबॉल परंपरा आज भी कायम है। वर्ष 2014 के बाद गांव से 88 खिलाड़ी राज्य स्तर और 13 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुके हैं। गांव में हर वर्ष फुटबॉल प्रशिक्षण शिविर लगाया जाता है। सुखवीर सिंह और अब्दुल रहमान को गांव के फुटबॉल इतिहास के प्रमुख प्रेरणास्रोत माना जाता है। वहीं सुखराम भाटी, मनोज जाट और शमशेर खान राजस्थान फुटबॉल टीम की कप्तानी भी कर चुके हैं।

प्रतिभा है, लेकिन सुविधाएं नहीं

फुटबॉल के प्रति जुनून होने के बावजूद जिले में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। नागौर के राजकीय जिला स्टेडियम में फुटबॉल मैदान तो है, लेकिन स्थिति बेहद खराब है। खिलाडिय़ों के लिए आवश्यक संसाधन, नियमित प्रशिक्षण और विशेषज्ञ कोचिंग नहीं है। सरकारी स्तर पर एक भी फुटबॉल कोच नहीं है। महिला फुटबॉल खिलाडिय़ों की संख्या भी नगण्य है।

सरकारी प्रयासों की कमी बनी बाधा

खेल प्रेमियों का मानना है कि फुटबॉल को योजनाबद्ध तरीके से प्रोत्साहन देने की जरूरत है। फरड़ोद जैसी प्रतिभा पूरे जिले में भरी पड़ी है। अधिकांश खिलाड़ी निजी प्रयासों और स्थानीय सहयोग के भरोसे आगे बढ़ रहे हैं। कई खिलाडिय़ों को उच्च स्तर का प्रशिक्षण लेने के लिए अन्य जिलों का रुख करना पड़ता है।

क्या कहते हैं फुटबाल खिलाड़ी

नागौर में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें निखारने के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण और सुविधाओं की जरूरत है। जिले में सरकारी फुटबॉल कोच की नियुक्ति समय की मांग है। सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास होने चाहिए।

मनोज जाट, फुटबॉल कोच एवं हेड रेफरी, राजस्थान फुटबॉल एसोसिएशन

राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के लिए खिलाडिय़ों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मिलनी चाहिए। जिला स्तर पर बुनियादी सुविधाएं विकसित हो तो अधिक खिलाड़ी आगे आ सकते हैं।

पूनमचंद निर्मल, राष्ट्रीय स्तरीय फुटबॉल खिलाड़ी

फरड़ोद की पहचान फुटबॉल से है, लेकिन जिले के अन्य क्षेत्रों में भी खेल संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी पहल जरूरी है। सरकारी स्तर पर किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिलती है।

शमशेर खान, राष्ट्रीय स्तरीय फुटबॉल खिलाड़ी

फुटबॉल का स्तर बढ़ा है, लेकिन नागौर के खिलाड़ी संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाते हैं। खेल ढांचे को मजबूत किए बिना प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना मुश्किल होगा। नागौर की बेहतरी के लिए हरसंभव प्रयास रहता है

डॉ. प्रहलाद फरड़ोदा, चेयरमैन, राजस्थान फुटबॉल एसोसिएशन

क्या कहते हैं अधिकारी........

नागौर जिला स्टेडियम में फुटबाल का कोई कोच तो नहीं है, लेकिन ग्राउण्ड जरूर है। ग्राउण्ड को बेहतर करने के लिए काम कराया जा रहा है।

सोहनलाल गोदारा, जिला खेल अधिकारी, नागौर