
government schools Cook helper has not received honorarium for 5 month
नागौर. जिले सहित प्रदेश में आठवीं तक के सरकारी विद्यालयों में रसोई की गर्मी में तपकर बच्चों के लिए दूध गर्म करने से लेकर दोहपर का भोजन तैयार करने वाली कुक कम हैल्पर्स की होली इस बार फीकी रहेगी। मात्र 1320 रुपए के मानदेय पर काम करने वाली कुक कम हैल्पर को अक्टूबर 2019 यानी पिछले पांच महीने से मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है। गौरतलब है कि कुक कम हैल्पर को जो मानदेय दिया जा रहा है, वह अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी का चौथा हिस्सा भी नहीं है।
राजस्थान सरकार ने गत वर्ष मार्च माह में ही प्रदेश में अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 225 रुपए प्रतिदिन तथा 5850 रुपए प्रतिमाह की थी, जबकि कुक कम हैल्पर का मानदेय मात्र 1320 रुपए महीना है, यानी एक दिन के मात्र 44 रुपए। कुक कम हैल्पर्स का कहना है कि बेरोजगारों को घर बैठे सरकार 3500 रुपए भत्ता देने की बात करती है, लेकिन गर्मी में भट्टी के पास तपने के बावजूद उन्हें काम करने के बावजूद 1320 रुपए दिए जा रहे हैं, सब वोटों की राजनीति है।
320 रुपए की बढ़ोतरी केवल कागजों में की
पिछले काफी समय से कुक कम हैल्पर का मानदेय बढ़ाने की मांग की जा रही थी, जिसको लेकर डेढ़ वर्ष पहले सरकार ने 1000 रुपए से बढ़ाकर 1320 रुपए का मानदेय किया, लेकिन यह भी कागजों में बढ़ाया गया। सूत्रों के अनुसार सरकार ने मानदेय बढ़ाने के साथ मई में 380 रुपए, जून में 530 रुपए, नवम्बर में 660 रुपए, दिसम्बर व जनवरी में 1195 रुपए मानदेय फिक्स कर दिया, इसके हिसाब से वर्ष भर का कुल मानदेय वही रह गया, जो पहले था।
अब दूध गर्म करने की जिम्मेदारी बढ़ी
पहले जहां कुक कम हैल्पर को दोपहर का भोजन ही पकाना पड़ता था, लेकिन गत वर्ष सरकार द्वारा दूध पिलाने की योजना शुरू करने के कारण कुक कम हैल्पर का काम बढ़ गया। दूध प्रार्थना के बाद दिया जाता है, इसलिए उन्हें दूध गर्म करने के लिए जल्दी आना पड़ता है। काम बढ़ा, लेकिन मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई।
पोषाहार से होती है कटौती
सूत्रों का कहना है कि नरेगा में मजदूरों को 200 से ढाई सौ रुपए की मजदूरी बैठे-बैठे मिल जाती है, ऐसे में पोषाहार पकाने के लिए कुक कम हैल्पर का इंतजाम करना शिक्षकों के लिए टेढ़ी खीर है। शिक्षक इस मजबूरी में पोषाहार में कटौती कर कुछ रुपए कुक कम हैल्पर को हर माह अतिरिक्त देते हैं, तब पोषाहार तैयार होता है। कई स्कूलों में शिक्षक खुद कलेक्शन करके देते हैं।
कानून का भी उल्लंघन
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में दोपहर के पोषाहार में काम करने वाले रसोइयों का मेहनताना बहुत ही कम है और यह मिनिमम डैली वैजेज कानून का भी उल्लंघन है। किसी भी योजना के सही क्रियान्वयन लिए उसका व्यावहारिक होना जरूरी है, लम्बे समय से चल रहे मीड डे मील कार्यक्रम में रसोइयों के साथ अन्याय हो रहा है। इनके हकों के लिए संघर्ष करने वाला कोई नहीं है, इसमें अधिकतर बेबस या विधवा महिलाएं काम करती हैं, इन्हें सुबह 9 से दोपहर बाद 2 बजे तक फुलटाइम कठिन परिश्रम करना होता है और 50 विद्यार्थियों पर एक रसोइया होता है, जिन परिवारों की आजिविका चलाना वैसे ही चुनौतीपूर्ण है, उन्हें पेट की आग बुझाने के लिए 44 रुपए रोजाना काफी नहीं है।
Published on:
08 Mar 2020 12:54 pm
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