
Hand tools industry is the source of employment for thousands of people of Nagaur
नागौर. देशभर में अपनी विशेष पहचान रखने वाले नागौर के हैण्ड टूल्स (हस्त-औजार) उद्योग से नागौर के हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है। हैण्ड टूल्स उद्योग में पुरुषों के साथ महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रही हैं। मुल्तानी लौहार समाज की महिलाएं न केवल हैण्ड टूल्स बनाने में हाथ से काम कर रही हैं, बल्कि समय के साथ आए बदलाव के चलते मशीनें भी चलाने लगी हैं। लौहारपुरा क्षेत्र में महिलाएं ग्राइण्डर, ड्रील सहित अन्य मशीनें चलाकर हैण्ड टूल्स बना रही हैं। हैण्ड टूल्स उद्योग को बढ़ावा देने के साथ इसमें रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए रीको ने भी गोगेलाव में विकसित किए जा रहे औद्योगिक क्षेत्र में 105 भूखण्ड आरक्षित किए हैं, जो केवल हैण्ड टूल्स उद्योग लगाने के लिए दिए जाएंगे। ऐसे में आने वाले दिनों में इस उद्योग में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। आज भारत में नागौर के हैण्ड टूल्स की इतनी अधिक डिमांड है कि जो भी माल तैयार किया जाता है, उसकी खपत भारत में ही हो जाती है। इसलिए रोजगार की काफी संभावनाएं हैं।
फैक्ट फाइल
- हैण्डटूल्स उद्योग का सालाना टर्न ओवर - 30 करोड़ रुपए
- जिला मुख्यालय पर कुल इकाइयां - 55 लगभग
- हैण्ड टूल्स उद्योग में कार्यरत श्रमिक व कारीगर - 12 हजार लगभग
ये बनते हैं हैण्ड टूल
नागौर शहर के लौहारपुरा सहित रीको क्षेत्र में संचालित फैक्ट्रियों में वर्तमान में मुख्य रूप से तैयार होने वाले हस्त औजारों में प्लायर (सरौता), टोंग्स (संडासी), कटर, नोज प्लायर, बालपेन, फ्रास पेन, स्ट्रेट पेन, हैमर, कतिया, पिनन्सर कटर, कुल्हाड़ी एवं ब्लैक स्मिथ टूल्स, मैसन तथा स्टोन कटिंग टूल्स आदि शामिल हैं।
पहले बनाते थे तोपें, आज बना रहे हस्त औजार
आजादी से पूर्व रजवाड़ों के काल में मुल्तान से आए लौहारों ने यहां तोपें बनाने का काम शुरू किया था। अंग्रेजों के शासन में तोपों का काम बंद हुआ तो ताले बनाने लगे, लेकिन समय के साथ ताले भी बंद होने लगे। इसके बाद इन कारीगरों ने सुनारी औजार बनाने शुरू किए, लेकिन 60 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय उप प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई द्वारा लगाए गए गोल्ड एक्ट के कारण सोने का काम कम हो गया, जिसने नागौर के कारीगरों की कमर तोड़ दी। इसके बाद मुल्तानी कारीगरों ने बाजार की मांग के अनुसार हस्त औजार बनाने शुरू किए, जो आज भी बना रहे हैं और बहुत कम रेट में बाजार में उपलब्ध करवा रहे हैं।
लॉकडाउन में महत्वपूर्ण साबित हुआ था हैण्ड टूल्स उद्योग
कोरोना महामारी के दौरान लगाए गए लॉकडाउन के चलते देश में छाई आर्थिक मंदी में नागौर का हैण्ड टूल्स उद्योग हजारों श्रमिकों एवं कारीगरों को रोजगार दे रहा था। भारत में हैण्ड टूल्स बनाने की शुरुआत करने वाले नागौर शहर का आज भी प्लायर टूल पर कब्जा है। यह एक ऐसा टूल है, जो सबसे ज्यादा नागौर में बनाया जाता है और कीमत भी नामी कम्पनियों की तुलना काफी कम होने से हर आदमी की पहुंच में है। इसलिए डिमांड भी ज्यादा रहती है।
सरकारी उदासनीता पड़ रही भारी
भारत की मदर इंडस्ट्रीज कहलाने वाले इस उद्योग ने दिन दुगनी और रात चौगुणी तरक्की कर देशभर में प्रसिद्धि पाई। 1975 से 1990 तक नागौर में 60 के करीब मैकेनाइज यूनिट लग गई और 1995 तक इस इंडस्ट्रीज का सालाना टर्न ओवर 50 करोड़ पार कर गया। बाद में सरकारी नीतियों व निर्यात में अनुदान कम करने से इस उद्योग में गिरावट आने लगी। जीएसटी में बड़े उद्योगों के बराबर कर लगाने, बिजली दरें महंगी होने तथा आर्थिक सहयोग नहीं मिलने के कारण आज स्थिति यह है कि मैकेनाइज यूनिटों की संख्या दिनों-दिन घट रही हैं।
एमएसएमई से नागौर के उद्योगों को नहीं मिल रही कोई सुविधा
देशभर में हैण्डटूल्स बनाने में विशेष पहचान रखने वाले नागौर शहर के उद्यमियों के लिए एमएसएमई (लघु, कुटीर एवं मध्यम उपक्रम) सफेद हाथी साबित हो रहा है। भारत सरकार ने कोरोना काल में लॉकडाउन के बाद उद्योगों को सहारा देने के लिए भले ही 20 लाख करोड़ के पैकेज में एमएसएमई को बड़ा बजट देने की घोषणा की थी, लेकिन नागौर में किसी उद्यमी को इसका लाभ नहीं मिल पाया। हैण्ड टूल्स उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि एमएसएमई उनके लिए उपयोगहीन साबित हो रहा है। नागौर में विभाग द्वारा रखी गई करोड़ों रुपए की मशीनें उनके लिए कोई काम नहीं आ रही हैं।
यह भी एक बड़ा कारण
हैण्ड टूल्स उद्यमी अपने उत्पाद को डिफाइन नहीं कर पा रहे हैं। माल की गुणवत्ता तो अच्छी है, लेकिन पैकेजिंग ठीक नहीं है। कई के ब्रांड भी रजिस्टर्ड नहीं है। निर्यात के लिए जरूरी मानदण्डों को पूरा नहीं कर पाने व साथ ही विपणन व्यवस्था ठीक नहीं होने यह उद्योग जिस स्तर पर होना चाहिए, वहां आज भी नहीं पहुंच पाया है। सालाना टर्न ओवर में भी कमी आई है।
हैण्डटूल्स निर्यात पर अनुदान कम करने से टूटी उद्योग की कमर
हस्त-औजार निर्यात पर वर्ष 1995 तक भारत सरकार की ओर से 7.5 प्रतिशत अनुदान दिया जाता था, जिसे सरकार ने घटाकर 1.9 रुपए प्रति किलो कर दिया है। इसके चलते जो लोग सीधा निर्यात नहीं करते थे, उन्हें नुकसान झेलना पड़ा।
सरकार तकनीकी प्रशिक्षण पर ध्यान दें
हैण्ड टूल्स उद्योग के चलते नागौर हस्त औजार नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। अकेले लौहारपुरा क्षेत्र में छह हजार से ज्यादा महिलाएं एवं पुरुष इस उद्योग से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। इसे बढ़ावा देने व माल की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकारी प्रोत्साहन के साथ तकनीकी शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
- शराफत मुल्तानी, प्रतिनिधि, नागौर हैण्डटूल्स एसोसिएशन, नागौर
105 भूखण्ड आरक्षित किए
गोगेलाव रीको क्षेत्र में हैण्ड टूल्स उद्योग के लिए 105 भूखण्ड आरक्षित किए गए हैं, जिसमें 250 वर्ग मीटर से लेकर 1500 वर्ग मीटर की साइज के शामिल हैं। इन भूखण्डों का आवंटन करने की प्रक्रिया को लेकर फाइल जयपुर मुख्यालय में विचाराधीन है।
- आरके गुप्ता, क्षेत्रीय प्रबंधक, रीको, नागौर
Published on:
01 Sept 2022 01:31 pm
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