
Holi Special - Dhoom of Holi with Fag Songs in Nagaur
नागौर. रंग, उमंग उत्साह और भाइचारे का पर्व होली जिले में एक माह तक मनाने की परम्परा रही है। सुर ताल और लय के साथ गाए जाने वाले फाग गीतों की शुरुआत गांवों और शहरों में होली के एक माह पहले होली का डांडा रोपने के साथ हो गई। इस परम्परा में गांव के सार्वजनिक स्थान गवाड़ में स्थानीय लोग परम्परागत रूप से होली का डांडा रोप कर उत्साह से फाग गीत गाने लगे हैं। पुरुषों की टोलियां चंग बजाकर फाग गीत गाती है तो महिलाओं के लिए इस माह का आकर्षण सामूहिक रूप से गाए जाने वाले होली के गीत होते हैं, इन्हे स्थानीय भाषा में लूर कहा जाता है। मोहल्लेवार होने वाले आयोजनों में लोग सामूहिक भागीदारी के साथ स्थानीय रीति रिवाजों का निर्वहन कर रहे हैं। दिन भर खेतों में काम करने वाले और अपने कामकाज में व्यस्त रहने वाले लोग भी शाम को सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित होकर फाग गीत गाते हैं।
कई दिन पहले करते तैयारी
फाल्गुन लगने से डेढ़ माह पहले ही फागण के रसिया ढोल एवं चंग की सार संभाल करना शुरू कर देते हैं। ढोल व चंग का चमड़ा मंढवाने से लेकर नाचने के लिए बड़े-बड़े घुंघरू की पायजेब भी घर के स्टोर से बाहर निकालकर सही कर ली जाती है। कई स्थानों पर बनने वाले स्वांग के साथ ही लोग नाचने के दौरान अलग-अलग वेश में नाचने की तैयारी पहले से ही कर लेते हैं।
डांडिया नाच की परम्परा
गोल घेरे के बीच में एक जने के गले में लटकाए बड़े ढोल पर लगने वाली डंके की चोट पर एक साथ नाचने के लिए उठते पांव दर्शक देखते ही रह जाते हैं। ढोल के डंके की चोट के साथ ही दोनों हाथ में पकड़े डांडिया से अपने दोनों ओर के साथियों के डांडिया से को छूते हुए नाचते हैं। ढोल पर डंके की चोट की आवाज के साथ ही सुर, ताल व लय का एसा समां बंधता है कि दर्शक मंत्रमुग्ध खड़े देखते ही रह जाते हैं। गोल घेरे में अलग-अलग वेशभूषा में 75 से 125 नाचने वाले जब हाथों के डांडिया के साथ ही पांव की धमक के साथ लय मिलाते हैं तो पांवों में बड़े-बड़े घूंघरू की पायजेब से निकलती झंकार को सुनकर नाचने वालों की छटा देखते ही बनती है। मारवाड़ के कई गांवों में होली से दस दिन पहले ही डांडिया नाच करने की परम्परा रही है। शहर में जगह-जगह पर डांडियां-गेर होली से पहले व रामा-सामां के दिन होंगी। शहर के लोढ़ा का चौक में पुरूष भी गेर के गीत गाएंगे। शहर के तेलीवाड़ा में भी डांडिया नाच होता है। इस डांडिया नाच को देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचेंगे।
शहर में कई स्थानों पर होलिका दहन
शहर में गली-मोहल्लों में लोग होलिका दहन करने की परम्परा का निर्वहन करते हैं। शहर के नया दरवाजा, राठौड़ी कुआं, माही दरवाजा, बंशीवाला मंदिर, तेलीवाड़ा, बाजरवाड़ा, लोढ़ा का चौक, लोहिया का चौक, बाठडिय़ा का चौक, कंसारों का मोहल्ला, बाड़ी कुआं सहित लगभग सभी मोहल्लों के साथ ही नई आबाद हुई कॉलोनियां हनुमान बाग, इंदिरा कॉलोनी, व्यास कॉलोनी, संजय कॉलोनी, हाऊसिंग बोर्ड, मानासर सहित लगभग सभी गांवों में होलिका दहन शुभ मुर्हूत में किए जाने की परम्परा है। इस दौरान होलिका दहन के बाद महिलाएं पूजन करके सामूहिक फाग गीत गाएंगी।
घर-घर जाकर निभाते ढूंढ़ की परम्परा
नवजात बच्चों के दीघार्यु होने की कामना को लेकर परिजन होलिका दहन करने वालों से अपने बच्चों की ढूंढ़ कराने की परम्परा का निर्वहन करेंगे। होलिका दहन के बाद ढूंढ़ करने वाले बड़़े बुजुर्ग बच्चों के साथ घर-घर जाकर ढूंढ़ मांगेंगे। नवजात बच्चे की पहली बार ढूंढ़ कराने पर परिजन गेरियों को और ढूंढ़ निकालने वालों को मिठाई खिलाते हैं।
रामा-सामा के साथ रंगों की होली
होलिका दहन के दूसरे दिन रंग के साथ ही भाइचारा देखने को मिलता है, जब लोग सभी प्रकार के आपसी वैर एवं भेदभाव भुलाकर रंग लगाते हुए गले मिलेंगे। बीते कुछ वर्षों से रंग के लिए गुलाल के साथ ही सिंथेटिक रंगों का प्रचलन अधिक बढ़ा है तो बच्चों के लिए रंगों की पिचकारियों का प्रचलन भी अधिक हुआ है। शहर सहित कई गांवों में भी आने जाने वालों को सामूहिक रूप से रंगने का रिवाज है जहां बड़े-बड़े कड़ाहों में भरे पानी में रंग घोल कर रखा जाता है। रंगों की होली खेलने में बच्चों के साथ महिलाएं भी पीछे नहीं रहती है।
अलग-अलग समाज की गेर
शहर में होली के दिन अलग-अलग समाज की गेर निकालने की परम्परा रही है। शहर के पुष्करणा समाज के लोग दिन भर चंग की थाप पर होली के गीत गाते हुए समाज के घर-घर जाकर होली की शुभकामनाएं देंगे। होली के अवसर पर परम्परा से होने वाला पुष्करणा समाज का झगड़ा देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैंं जहां आमने सामने हुए दो दलों के लोग फाग गीतों में एक दूसरे को गालियां देते हैं। रंग और गुलाल के धमाल के बीच परम्परागत गीतों से दोनों दलों का फाग गीतों से झगड़ा कोई चार से पांच घंटे तक होता है। होली के मौके पर माहेश्वरी समाज के लोगों की अलग से गेर निकलती है। अब भी चंग की थाप परगीत गाते हुए खेली जाने वाली होली के दौरान मनुहार में ठंडाई पिलाई जाती है।
Published on:
09 Mar 2020 12:24 pm
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