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राजस्थान की प्रमुख होलियों में से एक है डीडवाना की डोलची गैर

हाकम (उच्च अधिकारी) के डोलची मार कर की जाती है डोलची गैर की शुरूआत, रंग के स्थान पर किया जाता है सादे पानी का उपयोग, मालियों के 12 बासों की गैर भी खासी प्रसिद्ध

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holi special: Didwana's Dolchi gar

holi special: Didwana's Dolchi gar

डीडवाना (नागौर). यूं तो होली का त्यौहार खुद अपने आप में बहुत खास है, लेकिन डीडवाना की होली राजस्थान भर में खास पहचान रखती है। यहां खेली जाने वाली डोलची गैर नागौर जिले सहित प्रदेशभर में प्रसिद्ध है। डोलची एक विशेष प्रकार का बर्तन है जिसमें पानी भरकर पीछे से पीठ पर मारा जाता है।

इस पानी की गति इतनी तेज होती है कि पूरे बदन में तेज झनझनाहट दौड़ जाती है, ऐसा लगता है मानों पीठ में करंट का झटका सा लगा हो। होली के मौके पर डोलची की मार से बचने के लिए लोग अपनी पीठ पर प्लास्टिक के कट्टे, जूट का कपड़ा सहित अन्य तरह के मोटे कपड़े भी बांधते है ताकि पीठ पर मारी जाने वाली डोलची की मार को सहन किया जा सके। डोलची से पीठ पर गिरने वाले पानी की गति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पानी जब पीठ पर पड़ता है तो गोली चलने जैसी आवाज उत्पन्न होती है। हालांकि डोलची खेलने वाले अब मंझे हुए खिलाड़ी नही रहे है लेकिन अब भी यदि सांध कर डोलची से पानी पीठ में मार दिया जाए तो पूरे बदन में झनझनाहट दौड़ जाती है।

यूं करते है शुरूआत
डोलची गैर की शुरूआत भी अपने आप में खासा महत्व रखती है। डोलची खेलने वाले बड़ी संख्या में हाकम(उच्च अधिकारी) के यहां पहुंचते है। सबसे पहली डोलची हाकम को मारी जाती है, उसके बाद डोलची गैर की शुरूआत विधिवत हो जाती है। यही कारण है कि डोलची गैर को हाकम की गैर के नाम से भी जाना जाता है। डोलची गैर की शुरूआत कब हुई इसके बारे में स्पष्ट रूप से तो कहा नही जा सकता, लेकिन जब पत्रिका ने बुर्जुगो से इस संबंध में बात की तो उन्होने बताया कि डीडवाना में सनातन(राजा-महाराजाओं) के समय से डोलची गैर खेली जा रही है।

यह है महत्व
अनेको वर्ष पहले डोलची गैर की शुरूआत क्यों की गई इसका तो कोई स्पष्ट प्रमाण नही है लेकिन माना जाता है कि पीठ मे तेज गति से पडऩे वाले पानी से कमर दर्द सहित पीठ की बीमारियों से राहत मिलती है, मान्यता यह भी है कि पूरे वर्ष में पीठ में किसी प्रकार की बीमारी नही होती। होली पर रंग खेलने की शुरूआत भी हाकम के डोलची मार कर किए जाने के पीछे कारण यह है कि उच्च अधिकारी से एक प्रकार से होली खेलने की ईजाजत ली जाती है। हाकम से शुरूआत होने के बाद डोलची गैर आनन्द भवन, चारभुजा मंदिर, झालरिया मठ, बांगड़ चौक, मून्दड़ो की गली, कोट मौहल्ला, श्यामजी का चौक से होते हुए गगड़ो का चौक से नृसिंह चौक पंहुचकर सम्पन्न होती है।

बारह बासों की गैर भी खास
होली के मौके पर मालियों के बारह बासों द्वारा निकाली जाने वाली गैर भी क्षेत्र मे आकर्षण का केन्द्र रहती है। इस मौके पर गैर मे शामिल कलाकारों के द्वारा न केवल हास्यापद प्रस्तुतियां दी जाती हैबल्कि सांस्कृतिक प्रस्तुतियों सहित अलग-अलग स्वांग रचे जाते है। इसी के तहत अलग अलग बासों(मोहल्ला या क्षेत्र) से रवाना हुई गैर अजमेरी गेट से होते हुए आडका बास पंहुचती है। जहां पर हजारों की संख्या मे मौजूद लोगों द्वारा गैर का आनंद लिया जाता है।