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जानिए, नागौर के ईनाणा की होली क्यों है अनूठी

डांडिया नृत्य एवं होलिका दहन एवं होली उखाडऩे का अंदाज इस पर्व का मुख्य आकर्षण

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Inana village Holi

Inana's Holi festival unique

मूण्डवा (नागौर). भारत वर्ष में मनाया जाने वाला होली का पर्व आज के लोगों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। होलीकोत्सव आसूरी शक्तियों के विनाश एवं सात्विक गुणों की स्थापना का पर्व है। इस रंगीले त्योहार को लोग अपने-अपने अंदाज में मनाते हैं। उत्साह एवं उमंग का यह पर्व गांवों में आज भी परम्परागत तरीके से मनाया जाता है। मूण्डवा पंचायत समिति के ईनाणा गांव में होली के उत्सव को देखने के लिए आज भी हजारों की संख्या में दर्शक आते हैं।
यह गांव राष्ट्रीय राजमार्ग-89 पर जिला मुख्यालय नागौर से 13 किमी की दूरी पर आबाद है। जहां होली का त्योहार अपने अनूठे अंदाज के लिए ख्यातनाम है। यहां होली से पूर्व होने वाला डांडिया नृत्य एवं होलिका दहन एवं होली उखाडऩे का अंदाज इस पर्व का मुख्य आकर्षण हैं। इस पर्व को मनाने के लिए पूरे गांव के लोग एकत्र आते हैं।
अनोखी होली
गांव में होली का पर्व मनाने की परम्परा सदीयों से चली आ रही है। इसके लिए होली बनाने के लिए गांव की कांकड़ में सबसे बड़ी खेजड़ी को पूजा करके विधिपूर्वक काट कर लाया जाता है। चार बासो में आबाद इस गांव के जोधावतों के बास के लोग होली लाकर रोपने एवं दहन करने का कार्य करते हैं। होली लाने के लिए युवकों की टोली गाजे-बाजे के साथ जाती है तथा जयकारे करते हुए होली लेकर गांव में पहुंचते हैं। इस दौरान गांव की महिलाएं एवं कन्याएं होली पर जंवार उछालकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। होली का दहन से एक दिन पूर्व ही होली लाई जाती है। होली के दिन इसे जमीन में 6-7 फिट गहरा गड्डा खोदकर उसमें रोप दिया जाता है। इसे रोपने से पहले बालक-बालिकाएं अपने द्वारा बनाए गए गोबर के जिरमोटिए इसमें टांग देते हैं। होली आसानी से उखाड़ी नहीं जा सके इसके लिए खड्डे में झाडिय़ां व पत्थर डालकर उसे भर दिया जाता है।
होली के दिन गांव के रूपावतों के बास, गोगामंड एवं चंवरी के बास के लोग होली उखाडऩे के लिए दो छोटी खेजडिय़ों को विधिपूर्वक पूजन करके ले आते है। इन्हें स्थानिय बोली में सांगड़ा कहा जाता है। इन सांगड़ों को गांव के बीचों-बीच में लाकर डाल दिया जाता है। जिनकी कुछ हिस्से की छाल उतारकर ऊपर ध्वजाएं बांध दी जाती है। यह स्थान होली का दहन के स्थान से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर है। होली के दहन के समय से कुछ समय पहले ही ग्रामीण इन सांगड़ों को लाठियों व हाथों के बल पर उठाकर दौड़ते हुए होली का दहन के स्थान पर पहुंचते हैं।
सांगड़े ले जाते समय दोनों दलों में आगे निकलने की होड़ लगी रहती है। होली स्थान पर पहुंचने से पहले गांव के बीच में चार स्थानों पर इन सांगड़ों को खड़ा किया जाता है। निचे गिरने पर फिर इन्हें लेकर लोग दौडऩे लगते हैं। इस दौरान हलकारा गांव में होळी देखणने चालो की आवाज देता हुआ जाता है।
होली का दहन के समय पंडित लूणकरण दाधिच यज्ञ सम्पन्न करवाते हैं तथा होली का दहन की रस्म की जाती है। होली के चारों तरफ लगाई हुई पाईयों के जलने से जिरमोटिए भी जलने लगते हैं। होली उखाडऩे वाले दल के लोग आग बुझाने का प्रयास करते हैं। जबकि होली का दहन करने वाले लोग घेरा बनाकर इन्हें रोकने का प्रसास करते हैं।

जलते अंगारों की परवाह नहीं
होली उखाडऩे वाले दल के लोग होली को बुझाने के लिए जलती हुई होली पर चढ़ जाते है। इस दौरान उन्हें अंगारों से जलने का भय भी नहीं रहता है। यह लोग होली बुझाने के बाद उसे उखाडऩे का जतन करने में लग जाते हैं।
दोनों दलों द्वारा लाए गए सांगड़ों को जमीन के बराबर से लाव या बड़ी सांकल से होली को बांधा जाता है। इसके बाद लोग हाथों एवं लाठियों के सहारे इन सांगड़ों को ऊपर उठाते हैं। इस दौरान सकारात्मक शक्ति प्रदर्शन का बड़ा रोचक दृश्य उत्पन्न होता है। लोगों को उत्साहित करने के लिए ढोल-नंगाड़े व बाजे बजाए जाते हैं। लोग होइश....होइश...... की आवाज करते हुए देखते ही देखते जमीन में गहरी गड्डी हुई होली को उखाड़ देते हैं। होली उखडऩे के बाद सांगड़ों को पुन: उसी स्थान पर पहुंचाया जाता है। तथा होली को वहीं गिरा दिया जाता है। इस होली को खेत का मालिक अपने घर नहीं ले जाता है। इसका उपयोग मन्दिर में पूजा करने वाले परिवार ही करते हैं।


मनाते हैं शकुन
होली का दहन के समय ग्रामीण होली पर टकटकी लगाए देखते रहते हैं। गांव में ऐसी मान्यता है कि होली के आग की लपटें जिस दिशा में जाती है उसी दिशा में अच्छी वर्षा होती है तथा सुकाल होता है। दक्षिण में आग की लपटें जाना लोगों के मन में चिंता का कारण बन जाती है। क्योंकि दक्षिण में आग की लपटें जाना अकाल का प्रतीक होती है। लोगों का यह विश्वास काफी हद तक सिद्ध भी होता आया है।

Hanuman ram inania IMAGE CREDIT: patrika

लेते हैं ढूंढ
होली का दहन के बाद युवकों की टोलियां अपने-अपने मोहल्लों में हाथों में लाठियां लेकर निकल पड़ती है। इनका उद्देश्य पिछली होली के बाद जन्म लेने वाले बालकों को ढूंढना होता है। इस दौरान प्रत्येक घर पर यह टोलियां आडा दिज्यो पाडा दिज्यो....की बात कहते हुए दरवाजे पर लाठियों से दस्तक देती है।
जिस घर में नवजात शिशु होता है वहां ढूंढ की जाती है। इस दौरान एक युवक उस बालक को अपनी गोद में लेकर बैठता है तथा अन्य लोग उसके सिर पर लाठियां टकराकर बालक के निडर, साहसी, सुखी एवं समृद्ध होने की कामना करते हैं। बालक के परिजनों द्वारा दी गई मिठाई को यह लोग छिना-झपटी करके खाते हैं। जबकि बधाई में दी गई राशि का उपयोग गर्मी के दिनों में प्याऊ लगाने में किया जाता है।
एक मंच पर रामा-श्यामा
धुलण्डी के दिन सुबह-सुबह एक-दूसरे के घर जाकर रामा-श्यामा करने एवं आशीर्वाद लेने की परम्परा के अलावा गांव में एक साथ रामा सामा की परम्परा भी है। इस दौरान गांव के बड़े बुजुर्ग गंवाड़ में चौपाल पर एकत्र होते हैं तथा होली के रामा-श्यामा करने के बाद गांव के विकास के सम्बन्धित चर्चाएं करते है। इस दिन गांव से सम्बन्धित अहम् फैसले भी लिए जाते हैं।

Hanuman ram inania IMAGE CREDIT: patrika

डांडिया व स्वांग से मनोरंजन
होली से 10 दिन पहले से ही गांव के प्रमुख चौकों में डांडिया नृत्य शुरू हो जाता है। यह आयोजन रात्री में होता है। इस दौरान डांडिया नृत्य के जानकार आदमी विभिन्न प्रकार की पौशाकें पहनकर नृत्य करते हैं। डांडिया नृत्य का उत्साह इतना होता है कि बुजुर्ग भी नंगाड़े की थाप पर नाचने को मजबूर हो जाते हैं। नाचने वाले लोग सैनिक, किसान, दुल्हा, दुल्हन, बणजारी सहित कई प्रकार के रूप धारण करके पैरों में घूंघरू बांधकर नाचते है तो दर्शक टकटकी लगाए देखते ही रह जाते हैं।
दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए कुछ लोग विभिन्न प्रकार के स्वांग रचते हैं तथा हंसी ठिठौली करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। स्वांग रचने वाले इन लोगों की कोई निश्चित वेशभुषा नहीं होती। अलबता लोगों को हंसा देने के लिए वे स्त्री-पुरूषों की पौषाकें एक साथ ही पहन लेते हैं। छेनाराम मेघवाल, सीताराम इनाणियां, हड़मानराम सहित कई लोगों की टोली इसमें अपनी अहम भूमिका निभाती है।