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राजस्थान विधानसभा Assembly Elections 2023 के चुनावों में हर बार कई ऐसे राजनीतिक दल ताल ठोकते हैं, जो 10-15 साल बाद गायब हो जाते हैं। कुछ दल तो ऐसे हैं, जो एक चुनाव के बाद ही ठंडे पड़ गए। आजादी के बाद 1952 में चुनाव हुए, जिनमें कई क्षेत्रीय दलों ने अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन दो-तीन बार लगातार चुनाव लड़ने के बावजूद जब उन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला तो वे विलुप्त हो गए।
भारत निर्वाचन आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या 2354 थी, जिनमें से 92 प्रतिशत यानी 2174 ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी योगदान रिपोर्ट ही नहीं भरी। इसी प्रकार इनमें 2056 ऐसे भी हैं, जिन्होंने ऑडिट रिपोर्ट पेश नहीं की। राजस्थान में जिला वार देखें तो पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या वर्तमान में 66 है। 2018 के विधानसभा की बात करें तो कुल 86 राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ा, इनमें 50 से अधिक तो ऐसे नाम हैं, जिनके नाम भी मतदाताओं को याद नहीं है या पहली बार सुना।
यह थी 2018 के चुनाव की स्थिति
पिछले चुनाव में छह राष्ट्रीय पार्टियां थी, जिनमें भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सीपीआई, सीपीएम, एनसीपी है, जबकि राज्य पार्टियों की संख्या सात थी, शेष 73 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल थे। चुनाव में कांग्रेस को 100 सीट, भाजपा 73 सीट, बसपा को छह सीट, आरएलपी को 3 सीट, सीपीएम को 2 सीट, भारतीय ट्राइबल पार्टी को 2 व राष्ट्रीय लोक दल को एक सीट मिली। निर्दलीयों को 13 सीट मिली। इसी प्रकार 2013 के चुनाव में राष्ट्रीय दल छह ही थे, लेकिन राज्य दलों की संख्या 10 थी, जबकि पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दकों की संख्या 50 थी। 2013 के चुनाव में भाजपा को 163 सीट मिली, जबकि कांग्रेस को 21, बसपा को 3, एनपीपी को 4 तथा जमीदारा पार्टी को 2 सीट मिली थी।
जानिए, कौनसे चुनाव में कितनी पार्टियां थी
वर्ष 1952 में 190 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस, जन संघ, सोशिएलिस्ट, कम्यूनिस्ट, राम राज्य परिषद, हिन्दू महासभा सहित कुल 12 राजनीतिक पार्टियां थी। इनमें चार ऐसी पार्टियां थी, जिनसे एक भी प्रत्याशी नहीं जीता।
इसके बाद 1957 में 176 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस, जन संघ, पीएसपी, आरआरपी व सीपीआई पांच पार्टियों ने ही प्रत्याशी खड़े किए। इसमें सभी पार्टियों के उम्मीदवार जीते।
1962 के चुनाव में कांग्रेस, जन संघ, पीएसपी, आरआरपी व सीपीआई, एसडब्ल्यूटी, हिन्दू महासभा, सोशिएलिस्ट पार्टी सहित कुल आठ पार्टियों ने चुनाव लड़ा। इसमें हिन्दू महासभा के अलावा सबके प्रत्याशी जीते।
1967 में 184 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस, जन संघ, एसडब्ल्यूटी व संयुक्त सोशिएलिस्ट पार्टी सहित 8 पार्टियों ने चुनाव लड़ा, जिसमें तीन पार्टियों का एक भी प्रत्याशी नहीं जीता।
1972 के चुनाव कांग्रेस, जन संघ, एसडब्ल्यूटी व सोशिएलिस्ट सहित 9 पार्टियों ने चुनाव लड़ा, लेकिन तीन से एक भी नहीं जीता।
1977 में हुए 199 सीटों के चुनाव में जनता पार्टी, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम सहित 7 पार्टियों ने चुनाव लड़ा, लेकिन तीन पार्टियों को एक भी सीट नहीं मिली।
1980 में 200 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस के फाड़ हो गए, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई) व यू। इसके साथ भाजपा, जनता (जेपी) सहित आठ पार्टियों ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में पहली बार आई भाजपा ने 123 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें 32 पर जीत हुई।
1985 में 198 सीटों पर हुए चुनाव में भी 8 पार्टियों ने चुनाव लड़ा, जिसमें कांग्रेस, भाजपा, जेपी, सीपीआई, सीपीएम आदि पार्टियां थीं।
1990 में राजनीतिक पार्टियों की संख्या बढ़ने। लेकिन पहली बार भाजपा ने सबसे अधिक 85 सीटें जीती।
1993 के चुनाव में भाजपा, कांग्रेस के साथ सीपीआई और सीपीएम के साथ जेडी के अलावा पुरानी पार्टियों गायब होने लगी और नई पार्टियां आने लगी, जिन्हें करीब 10 प्रतिशत वोट लिए।
1998 के चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आई। भाजपा, सीपीएम, जेडी के साथ बीएसपी भी चुनाव में उतरी और 110 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन दो प्रत्याशी जीते। इसमें अन्य पंजीकृत दलों की संख्या काफी थी, जिन्होंने 185 उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन एक प्रत्याशी जीता।
इसी प्रकार 2003, 2008, 2013 में भी क्षेत्रीय पार्टियों की संख्या काफी बढ़ी, लेकिन सभी मिलकर पांच-छह सीटों से अधिक नहीं जीत पाई। 2008 के बाद पार्टियों की संख्या बढ़ने से उम्मीदवारों की संख्या 2 हजार से अधिक रही, लेकिन जीतने वाले एक प्रतिशत भी नहीं थे।
Published on:
02 Nov 2023 01:05 pm
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