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Nagaur news…सरकारी जमीन पर कब्जों का साम्राज्य, नगरपरिषद खामोशी से शहर की जमीन बन रही शिकार

सरकारी जमीन पर कब्जों का साम्राज्य, नगरपरिषद खामोशी से शहर की जमीन बन रही शिकार कच्चे चबूतरे से पक्के निर्माण तक सुनियोजित खेल, बाजार से कॉलोनियों तक फैला जाल

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नागौर. शहर में सरकारी जमीन पर कब्जे अब किसी छुपे हुए खेल का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि खुलेआम और सुनियोजित तरीके से किए जा रहे हैं। सडक़ों के किनारे एवं आवासीय क्षेत्रों से सटी सार्वजनिक भूमि पर खुलेआम अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। यह अतिक्रमण सोची-समझी साजिश के तहत एक तय पैटर्न पर चल रहा है। पहले सरकारी जमीन पर कच्चा चबूतरा बनाया जाता है, फिर उसे पक्का कर दिया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे आसपास की जमीन को घेरकर अपने भूखंड में मिला लिया जाता है। कुछ ही समय में सरकारी जमीन निजी संपत्ति में बदल जाती है। सूत्रों की माने तो नगरपरिषद को इन अतिक्रमणों की जानकारी होने के बावजूद आज तक न ही किसी को नोटिस दी गई, और न ही हटाने की कार्रवाई। वजह यह पूरा खेल नगरपरिषद की ओर से कथित रूप से मिलीभगत के चलते लंबे समय से खेला जा रहा है। बताते हैं कि इसी कारण अब तक नगरपरिषद की ओर से इस संबंध में कितने कब्जे चिन्हित हुए, कितनों पर कार्रवाई हुई का, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं है।

बाजार से कॉलोनियों तक कब्जों की बाढ़
शहर के सदर बाजार, गांधी चौक, दिल्ली दरवाजा जैसे प्रमुख बाजार क्षेत्रों से लेकर इंदिरा कॉलोनी, सोनी बाड़ी, प्रताप सागर कॉलोनी एवं कॉलेज रोड के आसपास की कॉलोनियों सहित नागौर की तमाम कॉलोनियों में यह कब्जा तेजी से फैल चुका है। जहां जगह मिली, वहीं कब्जा कर लिया गया। सडक़ किनारे की सरकारी जमीन अब कइयों की निजी संपत्ति का हिस्सा बन चुकी है।
नगरपरिषद की मिलीभगत से सरकारी संपत्ति को निजी बनाने का चल रहा खेल…!
इस संबंध में शहर के इन तमाम जगहों की पड़ताल की गई तो सभी जगहों पर अवैध रूप से सरकारी जमीन केा हथियाने का काला खेल का सच सामने आया। इस बाबत नगरपरिषद के विशेषज्ञों से बातचीत की गई कि क्या इस तरह कब्जा कर सरकारी जमीन को निजी बनाई जा सकती है क्या, जवाब मिला नहीं…! इस पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही के जवाब में अधिकारी कहते हैं कि कोई शिकायत होगी तो देख लेंगे, लेकिन शिकायत कौन करेगा, यहां तो इस तरह से अवैध रूप से सरकारी जमीन को हथियाने के काले खेल में सभी शामिल हैं, फिर शिकायत कौन करेगा के जवाब में अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं। नगरपरिषद के जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में यह मामला लाए जाने के बाद भी कार्यवाई नहीं करना, और न ही सर्वे कराना बताता है कि सरकारी जमीन को निजी जमीन बनवाने के काले खेल में खुद जिम्मेदारों का ही संरक्षण हैं, नहीं तो फिर अब तक सालों से चल रहे इस खेल में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया जाना बताता है कि यह कब्जा खुद जिम्मेदार ही करवानेे में लगे हुए हैं तो फिर कैसे हटेंगे कब्जे। अब ऐसे में यह शहर कैसे विकसित हो पाएगा, या टाउनशिप योजना कितनी कारगर हो पाएगी, इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है।
अवैध कब्जो ंसे सडक़ें सिकुड़ी
इन कब्जों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। कई जगहों पर चौड़ी सडक़ें अब सिमटकर रह गई हैं। इससे न केवल विकसित शहरी विकास की योजनाओं की मंशा पर पानी फिरने लगा है, बल्कि रही-सही सडक़ों के भी अब संकरी गलियों में बदलने का खतरा मंडराने लगा है।
पड़ताल: 80 प्रतिशत सरकारी जमीन पर कब्जा, हर दिन फैलता काला खेल

जांच में सामने आया है कि पिछले कई वर्षों से सुनियोजित तरीके से चल रहे इस अतिक्रमण के खेल में शहर की करीब 80 प्रतिशत सरकारी जमीन अब निजी भूखंडों का हिस्सा बन चुकी है। कब्जे कम होने की बजाय लगातार बढ़ रहे हैं और हालात यह हैं कि लगभग हर दिन शहर के किसी न किसी हिस्से में नया अतिक्रमण हो रहा है। स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने, क्षेत्रीय निरीक्षण और जिम्मेदार विभागों से जुड़े सूत्रों से बातचीत में यह स्पष्ट हुआ कि इस पूरे खेल की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही। इसका सीधा असर शहर की सडक़ों पर पड़ा है, जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं और कई स्थानों पर गलियों में तब्दील हो चुकी हैं। यह स्थिति तब है जब नागौर जिला मुख्यालय है और यहां कलक्टर, एडीएम, एसडीएम से लेकर नगरपरिषद आयुक्त तक बैठे हैं। इसके बावजूद शहर का विकास रुककर उल्टा अव्यवस्था और संकरेपन की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ यह है प्रावधान
राजस्थान में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं। राजस्थान नगर पालिका अधिनियम और संबंधित भू-राजस्व कानूनों के तहत नगरपरिषद या प्रशासन को अतिक्रमण चिन्हित कर नोटिस जारी करने, निर्धारित समय में कब्जा नहीं हटाने पर बलपूर्वक कार्रवाई करने और खर्च संबंधित व्यक्ति से वसूलने का अधिकार है। इसके अलावा जुर्माना, निर्माण ध्वस्तीकरण और गंभीर मामलों में पुलिस कार्रवाई तक का प्रावधान है। नियमों के अनुसार सार्वजनिक भूमि को मुक्त कराना और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित निकाय की जिम्मेदारी होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होने से अतिक्रमण का यह सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है।

कार्यवाई करेंगे…
इस संबंध में आयुक्त गोविंद सिंह भींचर का कहना है कि सरकारी जमीन पर अगर कोई कब्जा करेगा तो कार्रवाई की जाएगी। लेकिन हकीकत इसके उलट दिख रही है। शहर में लगातार बढ़ते कब्जे इस बयान को खोखला साबित कर रहे हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि इस पूरे खेल में अंदरखाने की मिलीभगत भी शामिल है।