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farmers news: अब मारवाड़ की धरा पर खारे पानी में लहलहाएगी रबी की फसलें

farmers news: मारवाड़ की धरा पर किसान अब खारे पानी में भी जीरा, सरसों, गेहूं, पीली सरसों, तारामीरा व ईसबगोल जैसी रबी फसलों की अच्छी पैदावार ले सकेंगे। ये संभव हो सकेगा नागौर जिला मुख्यालय के बीकानेर रोड स्थित कृषि अनुसंधान उप केन्द्र में तैयार की जा रही नई किस्मों से।

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Nagaur News : मारवाड़ की धरा पर किसान अब खारे पानी में भी जीरा, सरसों, गेहूं, पीली सरसों, तारामीरा व ईसबगोल जैसी रबी फसलों की अच्छी पैदावार ले सकेंगे। ये संभव हो सकेगा नागौर जिला मुख्यालय के बीकानेर रोड स्थित कृषि अनुसंधान उप केन्द्र में तैयार की जा रही नई किस्मों से। इसके लिए कृषि अनुसंधान उप केन्द्र में बीज उत्पादन का कार्य चल रहा है। केन्द्र में विभिन्न प्रकार की किस्मों का अनुसंधान अंतिम चरण में है, इसके बाद जो-जो किस्में बेहतर उत्पादन देंगी, उनके बीजों की बुआई के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा। शस्य विज्ञान विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. रोहितास बाजिया ने बताया कि लवणीय पानी में विभिन्न सिंचाई विधियों एवं बिजाई की विधियों से तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। लवण युक्त पानी से प्लास्टिक मल्चिंग के साथ-साथ सतही बूंद-बूंद सिंचाई से पानी का कम उपयोग होता है, जबकि उत्पादन अधिक होता है। इससे मृदा पर भी विपरीत प्रभाव कम पड़ता है।

बाजिया ने बताया कि लवण युक्त पानी एवं सामान्य पानी का मिश्रण करके जीरे में प्रयोग किया जा रहा है। इसमें यह देखा जा रहा है कि जीरे में किस अनुपात में पानी देने से अधिक पैदावार एवं बीज की गुणवत्ता अधिक रहती है। साथ ही किस अनुपात में जीरे की वृद्धि व गुणवत्ता अवरुद्ध हो जाती है, इसका भी पता लगाया जा रहा है। लवणयुक्त पानी का जीरे में उपयोग करके पौधों की वृद्धि एवं मृदा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा रहा है। इसमें प्रभाव को कम करने के लिए मृदा सुधारक, वर्मी कम्पोस्ट, मल्चिंग, खाद आदि का उपयोग किया जा रहा है, ताकि लवणयुक्त पानी का कम से कम प्रभाव पौधों की वृद्धि व मृदा स्वास्थ्य पर पड़े।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजदीप मुन्दीयाड़ा ने बताया कि अनुसंधान केन्द्र पर पीली सरसों की लगभग 18 अलग-अलग किस्में तथा भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) की सरसों की 15 किस्मों पर अनुसंधान कार्य पिछले 2 सालों से चल रहा है। गेहूं की किस्में जैसे एचआई-1605, एचआई-1620 व डीबीडब्ल्यू-88 कृषि विभाग की पीओपी में पिछले साल किसानों के लिए अधिक उत्पादन वाली क्षारीय व लवणीय सिंचाई के लिए उपयुक्त पाई गई। जौ की लवणीय व क्षारीय सिंचाई के लिए किस्में डीडब्ल्यूआरबी-137, आरडी 2907 व आरडी 2899 को अधिक उत्पादन व कम पानी चाहने वाली किस्में किसानों के लिए अनुसंधान में उपयुक्त पाई गई। तारामीरा की नई किस्में जैसे आरटीएम-1355 व आरटीएम-1624 अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त पाई गई। सरसों की खारे पानी में उपयुक्त किस्म सीएस-60 अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त पाई गई। पीली सरसों पर अनुसंधान कार्य चल रहा है, जिसमें पीली सरसों की किस्में जैसे वाईएसएच-10 व एनआरसीएस .05-02 खारे पानी में अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त पाई गई। डॉ. मुन्दीयाड़ा ने बताया कि जीरे में गुणवत्ता युक्त बीज उत्पादन के लिए प्रमाणित बीज का कृषि वैज्ञानिक की देखरेख में अनुसंधान जारी है।

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इस प्रकार हो रहा है अनुसंधान
उप केन्द्र पर लवणयुक्त पानी में जीरे की विभिन्न किस्मों का अनुसंधान कार्य हो रहा है, इसमें लवणयुक्त पानी के अनुकूल प्रबंधन।
कम पानी वाली फसलों का चयन।
हर साल गोबर की खाद का उपयोग।
मृदा सुधारक का निश्चित अनुपात में उपयोग।
लवण एवं सामान्य पानी का निश्चित अनुपात में उपयोग।
बूंद-बूंद सिंचाई का प्रयोग।
मृदा की ऊपरी सतह पर मल्चिंग।
सल्फर व जिप्सम का उपयोग करके अनुसंधान किया जा रहा है।
जीरा, सरसों, तारामीरा जैसी रबी फसलों का तैयार हो रहा बीज
नागौर में भूजल स्तर नीचे जाने से नहीं रहा मीठा पानी
खारे पानी में उत्पादन बढ़ाने का प्रयास

अनुसंधान उप केन्द्र पर रबी की मुख्य फसलें जैसे सरसों, गेहूं, जौ, तारामीरा, जीरा, ईसबगोल पर खारे पानी में अनुसंधान कार्य किया जा रहा है। साथ ही डीएसटी का एक प्रोजेक्ट भी चल रहा है, जिसमें संकर बाजरे व जीरे पर अनुसंधान कार्य हो रहा है।
डॉ. सेवाराम कुमावत, प्रभारी अधिकारी, कृषि अनुसंधान उप केन्द्र, नागौर।