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मांड गायकी परम्परा पर फिदा परिवार

- हजारी लाल का ऐसा जुनून

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Hajarilal and family

नागौर. केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारो देश... के सुरीले शब्द जब कानों में मिसरी घोलते हैं तो सुनने वाले वाह-वाह कह उठते हैं। राजस्थानी लोक संगीत की पहचान बनी हुई है मांड गायकी। एक अन्य गीत ‘ढोलां री मूमल चाले तो ले चालूं मरूधर देस...’जैसे गीत राजस्थानी संस्कृति का देश-विदेश में परिचय कराते हैं। आधुनिक संगीत के बीच मांड गायकी का अपना वजूद आज भी मौजूद है। जिले के डेगाना तहसील के चुई गांव के हजारी लाल का परिवार इस इस लोक गायन परम्परा को जीवित रख रहा है।
इस परिवार का हर सदस्य मांड गायकी का कलाकार है। 68 वर्षीय हजारी लाल ने बताया कि उसके पिता रणजीत लाल चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी करे लेकिन उन्होंने 5 वीं तक ही पढ़ाई कर स्कूल छोड़ दी और कलाकार बनने के लिए रवाना हो गए। उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ निवासी ओमप्रकाश चंचल से नाटक की शिक्षा ली तथा 15 वर्ष तक उनके साथ ही रहे। यहां आकर रियंा निवासी पं. श्रीकिशन की पार्टी में काम किया। और आज अपने भाई मुंशी खां, बद्रीखां, रूकनदीन, नानू खां, पुत्र हिदायत खां सहित बहनों को भी मांड गायकी का कलाकार बनाया। इनकी मां हीरा बाई तथा दादाजी मोमदीन भी लोकगीत गाते थे। हालांकि परिवार की आजीविका का सहारा आज भी खेती है, लेकिन वे देशभर में होने वाले कार्यक्रम में कला का प्रदर्शन करने जाते है।
मिले यह पुरस्कार
मांड गायकी के तहत राजस्थानी लोक गीत गाने पर राजस्थान रत्नाकर दिल्ली की ओर से 51 हजार रुपए का पुरस्कार मिला है। वेस्ट जोन कल्चर सेंटर उदयपुर की ओर से गुरु शिष्य परपंरा के तहत चार बच्चों को मांड गायकी सिखाने के लिए उसे चुना गया। उन्होंने बताया कि सरकार से किसी प्रकार से कोई भी सहयोग नहीं मिला। राजस्थान की लोक संगीत कला में से एक है। सरकार प्रयास करें तो बहुत कुछ हो सकता हे। कोई भी यह कला सीखना चाहे तो उन्हें बिना किसी शुल्क के सिखाएंगे।

सरकारी सहयोग नहीं
उन्होंने बताया कि सरकार का किसी प्रकार से कोई भी सहयोग नहीं मिल पा रहा है। यह राजस्थान की सुप्रसिद्ध कलाओं में से एक कला है। अगर सरकार प्रयास करें तो बहुत कुछ हो सकता हे। कोई भी यह कला सिखना चाहे तो उन्हें यह बिना किसी शुल्के के सिखाएंगे। इनका प्रसिद्ध गाना सावन के महीने में गाया जाने वाला गाना ‘बालम जी महारा, जीर मिर बरसे मह है’
रजवाड़ों के समय काफी लोकप्रिय थी
गेट को मारवाड़ी में मांडा बोलते हैं। शादी विवाह में दूल्हा जब दूल्हन के घर पहली बार आता है तो इस अवसर पर गाने वाले गीत को ही मांड कहा जाता है। वहीं कुछ अन्य इतिहासकार की माने तो महाराजा जसवंत सिंह, महाराजा विजय सिंह, अजीत सिंह व महराजा मानसिंह जैसे राजाओं ने मांड गायकों को काफी बढ़ावा दिया। महल में दर्जनों संगीतयज्ञी भी गाया करती थी। जिन्हें गायक या गायणी कहते थे। जैसलमेर इलाके को मांड कहा जाता है। ऐसे में वहां के नाम से भी इस शैली को जोड़ा जाता है। मांड गायकी की संस्कृति रजवाड़ो के समय में काफी लोकप्रिय थी। आज भी साल दो साल पर राजस्थान के शाही परिवारों में होने वाले उत्सवों, शादियों आदि में मांड गायकी ही होती ही है। जिसमें ऐतिहासिक गाथाओं को गायक बड़े रोचक ढ़ंग से प्रस्तुत करता है।