24 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Success Story: 8 महीने की बच्ची की देखभाल के साथ पढ़ाई, नागौर की मोनिका बनीं RPSC स्कूल लेक्चरर, हासिल की 6वीं रैंक

राजस्थान में नागौर की मोनिका चौधरी ने दृढ़ इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत के दम पर आरपीएससी स्कूल लेक्चरर परीक्षा में चयनित होकर समाजशास्त्र विषय में छठा स्थान हासिल किया है। 34 पदों में चयनित छह अभ्यर्थियों में स्थान बनाकर उन्होंने नागौर जिले का नाम रोशन किया।
2 min read
Google source verification

नागौर

image

Arvind Rao

Aug 24, 2026

nagaur monika chaudhary success story

Nagaur Monika Chaudhary Success Story (Patrika Photo)

Nagaur Monika Chaudhary Success Story: 'सफलता मिलने में भले ही देर हो जाए, लेकिन असफलता के डर से प्रयास कभी नहीं छोड़ने चाहिए। परिस्थितियां कैसी भी हों, रास्ते बदले जा सकते हैं, मंजिल नहीं।' इस बात को सच कर दिखाया है नागौर की 34 वर्षीय मोनिका चौधरी ने। उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, अटूट संघर्ष और कड़ी मेहनत के दम पर RPSC (राजस्थान लोक सेवा आयोग) स्कूल लेक्चरर (फर्स्ट ग्रेड) परीक्षा में समाजशास्त्र विषय से पूरे प्रदेश में 6ठीं रैंक हासिल की है। कुल 34 पदों के लिए हुए चयन में छठा स्थान पाकर उन्होंने न सिर्फ अपना सपना पूरा किया, बल्कि पूरे नागौर जिले का नाम भी रोशन किया है।

पारिवारिक दबाव और असफलताओं का दौर

मोनिका के लिए सफलता की यह राह कांटों भरी रही। शुरुआती दौर में पारिवारिक दबाव के कारण उन्होंने पढ़ाई के लिए विज्ञान-गणित (B.Sc.) विषय चुना। हालांकि, इस क्षेत्र में उनका मन नहीं लगा और वे बीएससी में लगातार तीन बार असफल रहीं।

लेकिन बार-बार मिली असफलता भी मोनिका के हौसले को नहीं डिगा सकी। उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी गलतियों से सीखा और स्ट्रीम बदलने का बड़ा फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने कला संकाय में प्रवेश लेकर बीए (B.A.) और फिर समाजशास्त्र (Sociology) से एमए (M.A.) की डिग्री हासिल की। समाजशास्त्र को ही अपना मुख्य लक्ष्य बनाकर उन्होंने फर्स्ट ग्रेड शिक्षक बनने की तैयारी शुरू की।

8 महीने की बच्ची और दो बच्चों की जिम्मेदारी के बीच की पढ़ाई

मोनिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती घर-परिवार और बच्चों के साथ पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना था। उन पर दो बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी थी, जिनमें से छोटी बच्ची तो महज 8 महीने की थी। इतनी कम उम्र की बच्ची को संभालने के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षा की गहन तैयारी करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने बेहतरीन टाइम मैनेजमेंट करते हुए दिन-रात पढ़ाई जारी रखी। इस कठिन सफर में उनके परिवार ने भी उनका पूरा सहयोग किया।

युवाओं के लिए बनीं मिसाल

मोनिका चौधरी की यह कामयाबी आज उन तमाम युवाओं और गृहणियों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो एक-दो असफलताएं मिलने या पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। मोनिका का मानना है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सही दिशा चुनने का एक अवसर होती है। उनकी यह संघर्ष गाथा साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी रुकावट आपको सफलता के शिखर तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।