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नागौर के हथकरघा को चाहिए सरकारी ‘सम्बल’, जानिए, क्या-क्या आ रही है परेशानी

उत्पादन का लक्ष्य बढ़े तो काम करने वालों की कमी नहीं, जिले में काम कर रही हैं एक हजार कतवारियां- राष्ट्रीय हथकरघा दिवस : प्रदेश में उत्पादन व बिक्री में दूसरे स्थान पर है नागौर का जिला खादी ग्रामोद्योग संघ

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Nagaur's handloom industry needs government support

Nagaur's handloom industry needs government support

नागौर. आधुनिक तकनीक से तैयार होने वाले वस्त्रों के बीच आज भी हथकरघा उद्योग अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। नागौर में हथकरघा उद्योग से जुड़े करीब एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। नागौर का जिला खादी ग्रामोद्योग संघ विपरीत परिस्थितियों में न केवल अपने आप को स्थापित किए हुए है, बल्कि प्रदेश में उत्पादन व बिक्री में दूसरे स्थान पर है। यह स्थिति तो तब है, जबकि संघ को सरकार से लक्ष्य ही कम मिल रहा है, यदि सालभर में चार-पांच करोड़ का लक्ष्य मिले तो रोजगार भी अधिक लोगों को मिलेगा और उत्पादन भी अधिक होगा।


गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 9 साल पहले आजादी में स्वदेशी आंदोलन के योगदान के रूप में हथकरघा को चिह्नित कर 'नेशनल हैण्डलूम डे' मनाने की शुरुआत की थी। उन्होंने इसके लिए महात्मा गांधी की तरह चरखे के साथ सूत कातते हुए खुद का फोटो भी खींचवाया था। इधर, प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी गांधीवादी विचारधारा का माना जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश खादी के हथकरघा उद्योग को उतना प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है, जितना मिलना चाहिए। यही वजह है कि नागौर जिले में पंजीकृत 1000 से अधिक कतवारियों को सालभर में मजदूरी के रूप में मात्र 10 से 12 हजार रुपए मिल पाते हैं। हालांकि गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर से पुण्यतिथि 30 जनवरी तक खादी उत्पादों पर सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है, जिसमें भारत सरकार 15 प्रतिशत तथा राज्य सरकार 35 प्रतिशत सब्सिडी देती है, लेकिन यह केवल चार महीने ही मिलती है, इसे यदि सालभर के लिए किया जाए तो उत्पादाें की बिक्री बढ़ेगी और कतवारियों व बुनकरों को प्रोत्साहन मिलेगा।

हथकरघा उद्योग एक नजर में
- 100 - बुनकर
- 1000 - कतवारियां
- 1.70 करोड़ का उत्पादन है नागौर संस्था का
- 50 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है खादी उत्पादों पर 2 अक्टूबर से 30 जनवरी तक
35 प्रतिशत इंसेटिव दिया जाता है कतवारियों को भारत सरकार की ओर से मजदूरी पर
3000 संस्थाएं काम रही हैं भारत में

खादी की दरी का मुकाबला नहीं

जिले में दरी बनाने का काम काफी स्थानों पर किया जाता है। इसमें साटिका, टांकला का काम देश ही नहीं विदेशों तक प्रसिद्ध है। नागौर खादी ग्रामोद्योग संघ के मंत्री तिलोकराम गर्ग ने बताया कि संस्था की ओर से दरी, दरी फर्श, स्कूली पट्टी के साथ राजीव शॉल व लेडीज शॉल का निर्माण भी करवाया जाता है। इसमें दरी फर्श की डिमांड काफी ज्यादा रहती है। खास बात यह है फर्श की दरी एक बार खरीदने के बाद काफी सालों में चलती है, इसलिए इसका मुकाबला नहीं है। इनकी खरीद मुख्य रूप से स्कूलों के लिए की जाती है। खादी संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि निजी व्यक्ति या संस्था की ओर से खादी उत्पाद खरीदने पर 50 प्रतिशत छूट दी जाती है, लेकिन सरकारी स्कूल या संस्था को 10 प्रतिशत छूट मिलती है।

ऑनलाइन होता है भुगतान

बुनकरों व कतवारियों को मजदूरी का भुगतान ऑनलाइन किया जाता है। भारत सरकार की ओर से कतवारियों को मजदूरी पर 35 प्रतिशत इंसेंटिव भी दिया जाता है। यह राशि भी ऑनलाइन खातों में जमा होती है। इसके साथ गत दिनों 30 जनाें को मकान बनाने के लिए 1.30 लाख की सब्सिडी भी भारत सरकार से दी गई।

लक्ष्य बढ़े तो ऊंचाइयां छू लें

खादी ग्रामोद्योग एवं हथकरघा को जीवित रखने के लिए सरकारी प्रोत्साहन को बढ़ाने आवश्यकता है। हालांकि साल में चार महीने 50 प्रतिशत दोनों सरकारों की ओर से सब्सिडी दी जाती है, लेकिन इसे सालभर के लिए किया जाए तो अधिक बिक्री बढ़ेगी और लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इसके लिए उत्पादन का लक्ष्य भी बढ़ाने की आवश्यकता है।
- एडवोकेट अर्जुनदास वैष्णव, अध्यक्ष, जिला खादी ग्रामोद्योग संघ, नागौर