
नागौर।
राजस्थान में नागौर से छह बार लोकसभा चुनाव जीतकर अपना राजनीतिक दबदबा रखने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री नाथूराम मिर्धा की पौती एवं पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा के सामने इस बार लोकसभा चुनाव में फिर से चुनावी प्रतिष्ठा कायम करने की कड़ी चुनौती होगी। कांग्रेस की गुरुवार देर रात को जारी पहली सूची में ज्योति मिर्धा को नागौर संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार बनाकर उन्हें एक बार फिर मौका दिया गया है।
ज्योति मिर्धा के लिए अब मौजूदा और बदली हुई परिस्थितियों में चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। उनके सामने मिर्धा परिवार के कम होते जा रहे राजनीतिक प्रभुत्व को फिर से कायम करने की चुनौती रहेगी। दरअसल, इस बार भी देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बढ़ते प्रभाव के कारण भाजपा प्रत्याशी से उनका मुकाबला आसान नजर नहीं आता और उन्हें चुनाव में कड़ी चुनौती मिलने की संभावना है।
पहले जीता, फिर हारा चुनाव
गौरतलब है कि ज्योति मिर्धा वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव नागौर से जीता था लेकिन इसके अगले चुनाव में वह मोदी लहर में भाजपा प्रत्याशी सीआर चौधरी के सामने चुनाव हार गई थी। चौधरी अभी केन्द्रीय मंत्री है और इस बार फिर उनको चुनाव मैदान में उतारे जाने की चर्चा है, लेकिन भाजपा ने अभी प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है।
'दादाजी' रहे हैं दिग्गज
ज्योति मिर्धा के दादा नाथूराम मिर्धा नागौर संसदीय क्षेत्र से वर्ष 1971 से 1980 तक लगातार तीन बार कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में चुनाव जीता। इसके बाद वह 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में कांग्रेस उम्मीदवार एवं उनके परिवार के रामनिवास मिर्धा से चुनाव हार गए थे।
इसके बाद उन्होंने फिर कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़ा और वर्ष 1989 से 1996 तक फिर लगातार तीन बार चुनाव जीता और राज्य में छह बार लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड कायम किया।
हालांकि जयपुर से भाजपा प्रत्याशी गिरधारी लाल भार्गव ने भी वर्ष 1989 से 2004 तक लगातार छह बार चुनाव जीतकर मिर्धा के छह बार चुनाव जीतने के रिकॉर्ड की बराबरी की। राजस्थान के पहले वित्त मंत्री रहे नाथूराम मिर्धा वर्ष 1952 से 1990 के बीच चार बार विधायक भी निर्वाचित हुए। लोकसभा चुनाव जीतने पर वह केन्द्रीय मंत्री भी बने।
उनका आजादी के बाद करीब 50 साल तक नागौर जिले में अपना राजनीतिक प्रभुत्व रहा। वह बलदेवराम मिर्धा द्वारा स्थापित किसान सभा में शामिल होकर मारवाड़ क्षेत्र में किसान नेता के रुप में भी उभरे। उनके निधन के बाद वर्ष 1997 में हुए उपचुनाव में नागौर से सहानुभूति लहर में उनके पुत्र भानुप्रकाश मिर्धा ने भाजपा प्रत्याशी के रुप में जीत हासिल कर उनके राजनीतिक प्रभुत्व को कायम रखा।
इसके बाद हुए तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसी मिर्धा परिवार के सदस्य को टिकट नहीं दिया और वर्ष 1998 एवं 1999 के चुनाव में कांग्रेस के रामरघुनाथ चौधरी तथा वर्ष 2004 में भाजपा के भंवर सिंह डांगावास ने चुनाव जीता। हालांकि वर्ष 2009 के चुनाव में फिर कांग्रेस ने मिर्धा परिवार पर भरोसा जताया और ज्योति मिर्धा को अपना उम्मीदवार बनाया और वह चुनाव जीतकर इस पर खरी उतरी। इस कारण उन्हें गत लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का टिकट मिल गया लेकिन मोदी लहर में वह चुनाव हार गई।
केन्द्रीय मंत्री रामनिवास मिर्धा के पुत्र हरेन्द्र मिर्धा ने भी विधानसभा चुनाव जीतकर मिर्धा परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन बाद में वह सफल नहीं रहे और कांग्रेस से टिकट नहीं मिला। हालांकि गत विधानसभा चुनाव में नाथूराम मिर्धा के भतीजे एवं पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा के पुत्र विजयपाल मिर्धा ने डेगाना से कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में चुनाव जीतकर मिर्धा परिवार के राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त होने से बचाया।
Published on:
29 Mar 2019 04:11 pm
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