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अब नागौर पैदा करेगा मारवाड़ी नस्ल के घोड़े, प्रदेश में 16.68 प्रतिशत गिरी यह नस्ल

प्राथमिक चरण में पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर कृत्रिम गर्भाधान का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा, ताकि जिले सहित प्रदेश के लोग मारवाड़ी नस्ल की घोड़ी से कृत्रिम गर्भाधान करवाकर बेहतर नस्ल का घोड़ा प्राप्त कर सकें।

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नागौर

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Amit Purohit

Feb 04, 2023

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शरद शुक्ला

नागौर. प्रदेश में गिरती मारवाड़ी नस्ल के उन्नत घोड़ों की संख्या से चिंतित राज्य सरकार ने इसके संवंर्धन के लिए अब विभिन्न जिलों में कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा शुरू की है, ताकि मारवाड़ी नस्ल के घोड़े की संख्या बढ़ सके। नागौर सहित जालोर, भीलवाड़ा, हनुमानगढ़, गंगानगर, चूरू व कुचामनसिटी का इस कार्य के लिए चयन किया गया है। पहले नागौर के अश्व पालकों को कृत्रिम गर्भाधान के लिए बीकानेर स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र जाना पड़ता था। प्राथमिक चरण में पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर कृत्रिम गर्भाधान का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा, ताकि जिले सहित प्रदेश के लोग मारवाड़ी नस्ल की घोड़ी से कृत्रिम गर्भाधान करवाकर बेहतर नस्ल का घोड़ा प्राप्त कर सकें। पुशपालन विभाग के अनुसार प्रदेश में मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों की संख्या में 16.68 प्रतिशत की गिरावट आई है।

सर्वाधिक कमी अजमेर संभाग में हुई है। यहां पर मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों की संख्या गिरकर 53.61 प्रतिशत रह गई है। जबकि बीकानेर जिला 46.55 प्रतिशत के औसत के साथ दूसरे नंबर पर है। वर्ष 2012 में जहां प्रदेश में कुल 37776 मारवाड़ नस्ल के घोड़े थे, वहीं वर्ष 2017 में यह संख्या 31476 पर आ गई। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शरत मेहता ने कृत्रिम गर्भाधान का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा था, जिसे मंजूरी मिल गई है। नागौर में इस येाजना पर कार्य शुरू भी कर दिया गया है।

ऐसे होता है कृत्रिम गर्भाधान:
डॉ. सुरेन्द्र किरड़ोलिया ने बताया कि सुंदरता एवं कदकाठी के लिए प्रसिद्ध मारवाड़ घोड़ी में एस्टर्स पीरियड लंबा होता है। घोड़ी 3 से 9 दिन तक हीट में रहती है और ये सीजनल ब्रीडर है इसलिए इनकी ब्रीडिंग सीजन मध्य फरवरी से मध्य अक्टूबर तक होती है । ये लोंग डे ब्रीडर व पोलिएस्टर्स पशु होता है। एक घोड़ी में 48-72 घंटे के अंतराल में दो बार कृत्रिम गर्भाधान किया जाता है, ताकि गर्भ धारण के प्रतिशत को बढ़ाया जा सके। यह नस्ल मुख्यत मारवाड़ के पाली, जालौर, जोधपुर, बाड़मेर ,सिरोही ज़िलों में पायी जाती है।

मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों की स्थिति:

संभाग वर्ष 2012 वर्ष 2017

अजमेर 7144 3314

जयपुर 4911 6446

कोटा 3544 4227

भरतपुर 2958 3488

जोधपुर 9025 6356

उदयपुर 4052 4362

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में प्रदेश में 3776 मारवाड़ नस्ल के घोड़े थे। वर्ष 2017 में यह संख्या 31476 हो गई।

क्या है मारवाड़ी नस्ल का घोड़ा:
मारवाड़ी नस्ल के घोड़े का नाम राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से पड़ा है, क्योंकि मारवाड़ क्षेत्र इनका प्राकृतिक आवास होता है। मारवाड़ क्षेत्र में राजस्थान के उदयपुर, जालोर, जोधपुर और राजसमंद जिले और गुजरात के कुछ निकटवर्ती क्षेत्र शामिल हैं। मारवाड़ी घोड़ों को मुख्य रूप से सवारी और खेल के लिए पाला जाता है। प्रमुख शरीर का रंग भूरा है, जबकि शरीर के अन्य रंग सफेद पैच के साथ रोन, शाहबलूत, सफेद और काले हैं। मारवाड़ी घोड़ों का शरीर 130-140 सेमी लंबा, 152-160 सेमी ऊंचाई, 166-175 सेमी दिल की परिधि, 60 सेमी चेहरे की लंबाई, 22 सेमी चेहरे की चौड़ाई, 18 सेमी कान की लंबाई और 47 सेमी पूंछ की लंबाई बिना स्विच के होती है। मारवाड़ी घोड़े काठियावाड़ी घोड़ों की तुलना में ज्यादा लम्बे होते हैं।