
मूंग की एमएसपी पर खरीद
नागौर. विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए एक सवाल के जवाब में प्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसलों की खरीद के सरकारी दावों की पोल खुल रही है। हालात यह है कि कई फसलों में सरकार तय लक्ष्य का आधा भी खरीद नहीं कर पा रही है। खासकर मूंग और सरसों जैसी प्रमुख फसलों की खरीद बेहद कम होने से किसानों को मजबूरन अपनी उपज बाजार में कम दामों पर बेचनी पड़ रही है। ऐसे में किसानों की आय दोगुनी करने के दावे भी खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं।
यह स्थिति तब सामने आई जब विधायक महंत बालकनाथ ने विधानसभा में सवाल पूछकर सरकार से वर्ष 2024 से 2026 तक समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद का लक्ष्य और वास्तविक खरीद का विवरण मांगा। सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों में कई फसलों की खरीद लक्ष्य से काफी कम पाई गई।
सरसों और चना खरीद में बड़ा अंतर
रबी 2024 में सरसों की खरीद का लक्ष्य 14 लाख 61 हजार मीट्रिक टन से अधिक रखा गया था, लेकिन वास्तविक खरीद करीब 3 लाख 51 हजार मीट्रिक टन ही हो सकी। वहीं चना की स्थिति और खराब रही, जहां 4 लाख 52 हजार मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले महज 1252 मीट्रिक टन खरीद ही हो पाई। हालांकि गेहूं की खरीद अपेक्षाकृत बेहतर रही, लेकिन लक्ष्य का 60 प्रतिशत ही खरीदा जा सका। सरकार ने गेहूं की खरीद का लक्ष्य 20 लाख मीट्रिक टन रखा, जिसके मुकाबले 12 लाख मीट्रिक टन से अधिक खरीद की गई। इसी प्रकार रबी 2025 में सरसों का लक्ष्य 13 लाख 22 हजार मीट्रिक टन रखा गया, लेकिन खरीद केवल 70 हजार मीट्रिक टन के आसपास ही रही। चना की खरीद भी 5.46 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य की तुलना में मात्र 54 हजार मीट्रिक टन की गई। वहीं गेहूं में लक्ष्य से अधिक खरीद की गई।
खरीफ फसलों में भी हालात कमजोर
खरीफ 2024 में मूंग का लक्ष्य 2 लाख 38 हजार 988 मीट्रिक टन था, जबकि खरीद करीब 1 लाख 45 हजार 888 मीट्रिक टन ही हुई। उड़द में तो स्थिति बेहद खराब रही, जहां 1 लाख 49 हजार मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 35 मीट्रिक टन खरीद दर्ज की गई। मूंगफली और सोयाबीन की खरीद भी लक्ष्य से काफी कम रही। इसी प्रकार खरीफ 2025 में भी मूंग, उड़द और सोयाबीन की खरीद लक्ष्य से काफी कम की गई। 19 फरवरी 2026 तक की गई खरीद के अनुसार सरकार ने जो आंकड़े पेश किए, उनमें मूंग का लक्ष्य 3 लाख 5 हजार मीट्रिक टन था, लेकिन खरीद करीब 1 लाख 62 हजार मीट्रिक टन ही हो पाई। उड़द में 1 लाख 68 हजार मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 492 मीट्रिक टन खरीद दर्ज हुई। मूंगफली का लक्ष्य 5.54 लाख मीट्रिक टन था, जिसके मुकाबले 3.13 लाख मीट्रिक टन खरीद की गई।
धीमी प्रक्रिया बन रही बड़ी वजह
कृषि विशेषज्ञों और किसानों का कहना है कि एमएसपी पर खरीद की प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल है। सबसे पहले तो सरकार पंजीकरण की प्रक्रिया समय पर शुरू नहीं करती। जब पंजीकरण शुरू होते हैं तो दिन में सर्वर काम नहीं करता, जिसके कारण किसानों को लाभ नहीं मिल पाता। जैसे-तैसे पंजीकरण हो भी जाए तो खरीद केंद्र देर से खुलते हैं और किसानों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। इससे किसान मजबूरी में मंडियों में कम दाम पर अपनी फसल बेच देते हैं।
किसानों पर बढ़ता आर्थिक दबाव
जिले में मूंग का उत्पादन करने वाले किसान रामनिवास, रामकरण, बंशीलाल, रामेश्वर आदि का कहना है कि जब फसल एमएसपी पर नहीं बिकती तो उन्हें लागत तक निकालना मुश्किल हो जाता है। खाद, बीज और परिवहन का खर्च भी पूरा नहीं हो पाता। ऐसे में सरकार की किसान हितैषी योजनाओं पर सवाल उठने लगे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में किसानों को राहत देना चाहती है तो एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था को मजबूत करना होगा। खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाने, प्रक्रिया को सरल बनाने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने जैसे कदम जरूरी हैं, तभी किसानों को एमएसपी का वास्तविक लाभ मिल पाएगा।
Published on:
17 Mar 2026 11:20 am
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