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सरकार के अजीब फरमान, जेएलएन की लैब पांच किमी दूर होगी स्थापित

जेएलएन अस्पताल में रोजाना की ओपीडी 900 से 1000 के बीच, एमसीएच विंग में मात्र 300 से 400 ही, पीएमओ ने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को सूचना दिए बिना निकाले आदेश, जेएलएन अस्पताल में लैब नहीं होने से मरीजों को समय पर नहीं मिल पाएगी जांच रिपोर्ट

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नागौर. जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पंडित जेएलएन राजकीय जिला चिकित्सालय की सेंट्रल लैब को अस्पताल परिसर से करीब पांच किलोमीटर दूर एमसीएच विंग के पास स्थापित करने की तैयारी हो रही है। एनएचएम के मिशन निदेशक व चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं के संयुक्त शासन सचिव के आदेशों की पालना का हवाला देते हुए जेएलएन अस्पताल के पीएमओ डॉ. आरके अग्रवाल की ओर से जारी इस आदेश ने चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस फैसले से मरीजों को जहां जांच के लिए दूर जाना पड़ेगा, वहीं मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई और मान्यता पर भी संकट की आशंका जताई जा रही है। खास बात यह है कि अस्पताल के पीएमओ ने यह आदेश मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को औपचारिक सूचना दिए बिना ही जारी कर दिया।

गौरतलब है कि जेएलएन अस्पताल जिले का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा केंद्र है, जहां रोजाना करीब 900 से 1000 मरीज ओपीडी और आईपीडी में पहुंचते हैं। वहीं एमसीएच विंग में प्रतिदिन केवल 300 से 400 मरीज ही आते हैं। ऐसे में सेंट्रल लैब को मुख्य अस्पताल से पांच किलोमीटर दूर स्थानांतरित करने का निर्णय मरीजों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में ऑपरेशन और आपातकालीन उपचार के दौरान तत्काल जांच रिपोर्ट की जरूरत होती है। यदि लैब अस्पताल परिसर में नहीं होगी तो इमरजेंसी जांचों में देरी हो सकती है, जिससे उपचार प्रभावित होने की आशंका है।

एमबीबीएस स्टूडेंट के साथ नर्सिंग, डीएमएलटी व इंटर्न स्टूडेंट को भी होगी परेशानी

विशेषज्ञों का कहना है कि इस निर्णय से मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित होगी। एमबीबीएस के साथ नर्सिंग, डीएमएलटी और इंटर्नशिप कर रहे डॉक्टरों को सेंट्रल लैब में प्रैक्टिकल प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन प्रस्तावित नए लैब एक तो पांच किलोमीटर दूर है और दूसरा, लैब परिसर में पर्याप्त जगह नहीं होने की बात सामने आ रही है, जिससे विद्यार्थियों को पढ़ाने में भी परेशानी हो सकती है।

मेडिकल कॉलेज की मान्यता पर खड़ा हो सकता है संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज में सेंट्रल लैब का अस्पताल से जुड़ा होना जरूरी होता है। यदि लैब को अलग स्थान पर स्थापित किया जाता है और उसे पीपीपी मोड पर संचालित किया जाता है तो नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) की निरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मेडिकल कॉलेज की मान्यता पर भी सवाल उठ सकते हैं। इस संबंध में पीएमओ डॉ. आरके अग्रवाल से बात करने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। वहीं मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल संदीप चौधरी ने बताया कि लैब को शिफ्ट करने से संबंधित पीएमओ ने उन्हें कोई सूचना नहीं दी।

मरीजों को होगी सबसे ज्यादा परेशानी

- जांच के लिए मरीजों को 5 किमी दूर जाना पड़ेगा।

- रिपोर्ट लेने के लिए दोबारा अस्पताल आना पड़ेगा।

- इमरजेंसी जांचों में देरी से इलाज प्रभावित होने की आशंका।

- ऑपरेशन वाले मरीजों की त्वरित जांच मुश्किल।

मेडिकल छात्रों की पढ़ाई पर असर

- एमबीबीएस, नर्सिंग और डीएमएलटी विद्यार्थियों को प्रैक्टिकल में दिक्कत

- इंटर्न डॉक्टरों का प्रशिक्षण प्रभावित होने की संभावना

- नए लैब परिसर में पर्याप्त जगह नहीं होने की चर्चा

- डॉक्टर्स के लिए अलग चैंबर भी नहीं बने

जिम्मेदारों के पास नहीं इन सवालों के जवाब

जेएलएन जिला अस्पताल में एक तरफ मेडिकल कॉलेज के हिसाब से पिछले करीब एक -डेढ़ साल से तोड़-फोड़ कर बदलाव व संशोधन किया जा रहा है। इसके साथ जेएलएन अस्पताल परिसर में 190 बेड का अस्पताल भवन बनकर तैयार हो चुका है, वहीं पास में सीसीयू का निर्माण किया जा रहा है। ताकि मेडिकल कॉलेज के स्तर का अस्पताल तैयार किया जा सके और मरीजों को सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज स्थानीय स्तर पर मिल सके, लेकिन दूसरी तरफ जिम्मेदार ऐसे निर्णय लेकर कॉलेज की मान्यता पर ही संकट खड़े कर रहे हैं।