
नागौरी अश्वगंधा
नागौर. कभी नागौर के जंगलों और बंजर इलाकों में स्वतः उगने वाली साधारण औषधीय वनस्पति के रूप में पहचानी जाने वाली ‘नागौरी अश्वगंधा’ आज वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना चुकी है। हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक नेताओं को उपहार स्वरूप नागौरी अश्वगंधा भेंट कर न केवल भारत की आयुर्वेदिक परंपरा का गौरव बढ़ाया, बल्कि नागौर की इस विशिष्ट औषधीय फसल को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई।
प्रधानमंत्री की ओर से वैश्विक नेताओं को नागौरी अश्वगंधा भेंट करना केवल एक उपहार नहीं, बल्कि नागौर की मिट्टी, किसानों की मेहनत और भारत की हजारों वर्ष पुरानी आयुर्वेदिक परंपरा को विश्व मंच पर सम्मान दिलाने का प्रतीक है। इससे न केवल नागौर की पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय किसानों के लिए नए बाजार और बेहतर आर्थिक अवसर भी खुलेंगे।
नागौरी अश्वगंधा सबसे खास
नागौर जिले की शुष्क जलवायु, रेतीली मिट्टी और विशेष भौगोलिक परिस्थितियां यहां उगाई जाने वाली अश्वगंधा को अन्य क्षेत्रों की अश्वगंधा से अलग बनाती हैं। इस कारण इसे भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ है। कृषि अनुसंधान उप केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजदीप मुंदियाड़ा के अनुसार नागौरी अश्वगंधा में विथेनोलाइड्स, जड़ भंगूरता और स्टार्च की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो इसके औषधीय गुणों को और प्रभावी बनाती है। आयुर्वेद में अश्वगंधा को ‘रसायन’ श्रेणी की महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी माना जाता है। इसका उपयोग ऊर्जा बढ़ाने, मानसिक तनाव कम करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने और समग्र स्वास्थ्य सुधारने में किया जाता रहा है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी इसके गुणों की पुष्टि कर रहे हैं। इससे वैश्विक बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
नागौरी वेलफेयर सोसायटी की महत्वपूर्ण भूमिका
गौरतलब है कि नागौरी अश्वगंधा को जीआई पहचान दिलाने में नागौरी वेलफेयर सोसायटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संस्था ने इस फसल की विशिष्टता, गुणवत्ता और नागौर क्षेत्र से इसके ऐतिहासिक संबंध को प्रमाणित कर जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया को सफल बनाया। इस कार्य में आरएएस अधिकारी अमन चौधरी के साथ आईसीएआर - डायरेक्टोरेट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स रिसर्च, आनंद तथा राजस्थान कृषि विभाग का भी सहयोग रहा।
जंगल से एक-एक पौधे से जुटाया असली बीज
नागौर के निकटवर्ती मालगांव निवासी किसान प्रकाश ढाका बताते हैं कि उन्होंने पिछले वर्ष 10 बीघा भूमि में नागौरी अश्वगंधा की खेती की थी। जंगल में उगी अश्वगंधा के एक-एक पौधे से बीज एकत्र किए। फसल को तैयार होने में लगभग 10 माह का समय लगता है। उन्होंने बताया कि इसकी जड़ों के साथ बीज भी मूल्यवान होते हैं, जिनकी कीमत करीब तीन हजार रुपए प्रति किलो तक है। बीजों को पक्षियों और अन्य जीवों से बचाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती होती है।
सरकार बीज उपलब्ध करवाए
नागौरी अश्वगंधा हम किसानों की आय बढ़ाने और आजीविका प्रदान करने में वरदान साबित हो रहा है। प्रति बीघा 2-3 क्विंटल जड़ों का उत्पादन हो रहा है। यदि सरकार बीज रियायत दर पर उपलब्ध करवा दे तो लाभदायक होगा।
- माणक चौधरी, प्रगतिशील किसान, अमरपुरा
बेहतर बाजार उपलब्ध कराने का प्रयास
नागौर की शुष्क जलवायु, रेतीली मिट्टी और प्राकृतिक परिस्थितियां अश्वगंधा की इस विशेष किस्म को विशिष्ट बनाती हैं, जो अपनी गुणवत्ता और औषधीय महत्व के कारण प्रसिद्ध है। द नागौरी वेलफेयर सोसाइटी किसानों को प्रशिक्षण देने, तकनीकी ज्ञान और उत्पाद के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है।
- पारुल चौधरी, अध्यक्ष, द नागौरी वेलफेयर सोसाइटी
Published on:
21 Jun 2026 10:33 am
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