
कवि मनोज व्यास
विपदा की घड़ी में फंसी है कितनी जान,
फुटपाथों पर तडफ़ रहा मेरा हिंदुस्तान।
अट्टालिकाएं देखो कैसे अट्टहास कर रही हैं,
गर्वोन्मत्त होकर यों अपना बयां कर रही हैं।
अकिंचन प्राणियों पर दु:खों का पहाड़ टूटा,
न जाने आज भगवान भी क्योंकर है रूठा?
मूकदर्शक बनके बैठा देखो अपना रखवाला,
खामोश होके छिन गया कितनों का निवाला।
चहुं ओर महामारी, सकल देश में हाहाकार,
लोकतंत्र के वैभव बनके रह गए क्यों प्राकार?
वसुधैव कुटुम्बकम् के घोष से कभी सुख पाता,
जब भारत विश्व गुरु और था शांति अधिष्ठाता।
आज अहर्निश यहां दु:ख के बादल मंडराए हैं,
सुख की अभिलाषा में सब लोग डरके थर्राए हैं।
कंटकावृत राहों पर आज हर कोई चल रहा है,
धीरज खोकर हर व्यक्ति कैसी आहें भर रहा है।
कोरोना की आड़ में कोई अपनी जेबें भरता,
गद्दारी के जलवे देखो कोई षडयंत्र है करता।
मदद के बहाने राजनीति के पेंतरे नजर आते हैं,
साधु के वेश में कितने रंगे सियार नजर आते हैं।
चीखें, चीत्कारें और ये शिशुओं की करुण पुकारें,
क्षोभ व टीसें देखो जता रही माताओं की कतारें।
मचलते रह गए दिल में कितने लोगों के अरमान,
इनकी आशाओं को पूरा करो मेरे भारत महान।
दान और परोपकार को अपनाके सुख पाओ,
जीवन में उदारता के विचारों को दिखलाओ।
संकट की घड़ी में बन जाओ इक दूजे का सहारा,
सब हो सुखी, बन जाए अभी यही निनाद हमारा।
- कवि मनोज व्यास, व्याख्याता, राउमावि, जोधियासी (नागौर)
Published on:
08 Sept 2020 04:41 pm
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