
खजवाना. क्षेत्र के एक खेत में पान मैथी की कटाई करते किसान।
राजवीर रोज
नागौर जिले के खजवाना , कुचेरा मूण्डवा सहित कई क्षेत्रों में उगाई जाने वाली नागौरी पान मैथी देश -विदेश की होटलों तक में अपनी महक बिखेर रही है लेकिन जीआई टैग को तरस रही है। व्यंजन को लजीज बनाने वाली पान मैथी 2017 में नोटिफाई कमोडिटी में तो शामिल हो गई, लेकिन भौगोलिक संकेतक का अब भी इसे इंतजार है।
गत वर्ष दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर व राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान संस्थान, अजमेर ने मिलकर नागौरी पान मैथी पर अनुसंधान करने का राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा था। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण अनुसंधान शुरू नहीं हो पाया। प्रस्ताव में बताया गया था कि नागौरी पान मैथी की फसल में डाले जा रहे कीटनाशकों, जैव उत्तेजक व पोषक तत्वों तथा पान मैथी के बीज की गुणवत्ता सुधार पर विशेष अनुसंधान की आवश्यकता है। बाजार में पान मैथी का हाईब्रिड बीज भी उपलब्ध नहीं है। इस कारण कई बार नकली पान मैथी का बीज किसान को बेचकर ठगी का प्रयास भी किया जा चुका है। अगर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद सक्रियता दिखाए तो पान मैथी का नाभिक बीज तैयार कर उससे ब्रिडर सीड, फाउण्डेशन सीड बनाने के बाद वाणिज्यक बीज बनाकर किसानों तक पहुंचाया जा सकता है। शुद्ध बीज किसानों तक पहुंचने से गुणवत्ता व महक दोनो में इजाफा हो पाएगा।
35 वर्ष पुरानी पूसा कसूरी मैथी का बीज काम लेना मजबूरी
करीब 35 वर्ष पूर्व पूसा संस्थान दिल्ली की ओर से विकसित पूसा कसूरी मैथी का बीज आज भी किसान बिना उपचारित किए काम में ले रहे है। जबकि इस बीज में समरूपी खरपतवार जैसी कई अशुद्धियां मिल चुकी है। इससे पान मैथी के उत्पादन के साथ गुणवत्ता में भी कमी आ रही है।
पाकिस्तान में कसूरी मैथी को जीआई टैग, भारत में नागौरी पान मैथी को नहीं ?
जानकारी के मुताबिक भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान के पंजाब स्थित कसूर क्षेत्र में पान मैथी की खेती की जाती है तथा भारत में राजस्थान के नागौर जिले में पान मैथी उगाई जाती है। करीब 30 वर्ष पूर्व पाकिस्तान में कसूरी मैथी को जीआई टैग मिल चुका है पर भारत में नागौरी पान मैथी आज भी जीआई टैग को तरस रही है। जबकि संसाधन के मामले में भारत, पाकिस्तान से कई गुना आगे है।
जानिए क्या है जीआई टैग
भारतीय संसद ने दिसम्बर 1999 में जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट पारित किया था। जो 15 सितम्बर 2003 से लागू हुआ। जीआई टैग से तात्पर्य भौगोलिक संकेतक से है जो उन उत्पादों पर इस्तेमाल किया जाने वाला एक संकेत है, जिनकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति होती है। इससे उस क्षेत्र की पहचान कायम हो पाती है।
यह होंगे जीआई टैग के फायदे
- उत्पाद को कानूनी सुरक्षा
-उत्पाद के अनधिकृत उपयोग पर रोक
-प्रमाणिकता का आश्वासन
-राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय बाजारों में जीआई टैग वस्तुओं की मांग बढने से उत्पादकों की समृद्धि को बढावा मिलता है
-उत्पाद की विश्वसनीयता को बढ़़ावा मिलता है।
इनका कहना...
पान मैथी की खेती बीज की अनुवांशिकता, क्षेत्र का भौतिक वातावरण व कटाई तथा सुखाने के प्रबंधन के समावेशन का प्रतिफल है। अभी तक किसान केवल प्रबंधन के पहलु पर काम कर रहे हैं, जबकि असल में पान मैथी के बीज की अनुवांशिकता व भौतिक वातावरण पर अनुसंधान से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। आनुवंशिकी, वातावरण और प्रबंधन के बीच के संबंध को समझने से ही भौगोलिक चिन्ह प्राप्त करने में आसानी होगी
डॉ .भागीरथ चौधरी
निदेशक, दक्षिण एशिया जैवप्रौद्योगिकी संस्थान, जोधपुर।
नागौर कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ सेवाराम कुमावत ने कृषि विशेषज्ञों की टीम गठित की है जो पान मैथी की रसायनिक संरचना का पता लगा रही है। मेरे साथ डॉ सौरभ जोशी, डॉ रेखा सोडाणी व डॉ एस आर शर्मा की टीम इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। पान मैथी के पत्तों का नमूना लैब जांच के लिए भेजा हुआ है।
डॉ. विकास पावडि़या
सहायक आचार्य ,
कृषि महाविद्यालय, नागौर
प्रशासनिक तौर पर उच्चाधिकारियों को पान मैथी के जीआई टैग के सम्बध में पत्र लिखेंगे। हमारा प्रयास रहेगा कि नागौरी पान मैथी की भौगोलिक पहचान कायम हो।
अमिता मान,
उपखण्ड अधिकारी,
मूण्डवा (नागौर)
Updated on:
27 Dec 2023 02:06 pm
Published on:
27 Dec 2023 02:04 pm
